एक अधूरा रिश्ता
मनीष कुमार सिहारे
बालोद, (छत्तीसगढ़)
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ये सच है, हकिकत है,
या कोई कहानी तो नहीं
करते थे मिट्ठे बातें तुम,
वो फरे बानी तो नहीं
तेरे सजदे में कहते मैंने
लाखों से सुना है
क्या वो सच है,
या झुठी जुबानी तो नहीं
क्या खता थी मेरा
जो तुम ऐसे कहर दें रहे हो
ना कुबुली थी तो ना कुबुली कह देते
हाँ क्यों कह गए हो
अब क्या कहूं जाकर उनसे
होंठों पे ख़ुशी जो छायी है
क्या छिन लेगा वो सारी खुशियां
बदनामी की कहर जो आयी है
ईश्वर का खेल बड़ा
निराला क्यों होता है
जो बाहर से हंसता है
वो अंदर ही अंदर क्यों रोता है
इस कदर है स्थिति हमारी
किससे मैं ये बयां करुं
कर गई जो घर इस दिल में
कैसे उसको विदा करुं
मैं तो मैं था
अपनों की सोची होती
बचपन से पाला जिसने
कुछ तो रहम की होती
क्या खता रही उन बेबस नादानो की
जो तुम ऐसे कहर दें रहे हो
ना कुबुली थी तो ना कुबुली कह देत...

























