तुझसे आस लगाएं बैठी हूँ
आयुषी दाधीच
भीलवाड़ा (राजस्थान)
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मैं तुझसे आस लगाएं बैठी हूं,
तु आए तो,
मैं अपना मन हल्का कर डालूं,
कुछ अपने मन की,
तो कुछ तेरे मन की,
बात मैं कर डालूं,
मैं तुझसे आस लगाएं बैठी हूं ।
तु तो चंचल मन की हठ वाली है,
आधी राह से फिर मुड़ जाती है,
मैं राही तेरी आस में वही रुक जाती हूँ,
तुम मुझसे मिलने आओगी ना,
मैं तुझसे आस लगाएं बैठी हूं ,
तु आए तो,
मैं अपना मन हल्का कर डालूं।
सारे जग में,
मैं तेरी ही बात करती हूँ,
फिर भी तुम मुझसे खफा हो जाती हो,
मैं तुम्हें पूर्ण करना चाहूँ,
तब तुम अधूरी सी रहती हो,
मैं तुझसे आस लगाएं बैठी हूं।
तुम अपनी मनमानी करती हो,
मेरा मन जब अशांत हो,
तो तुम अपनी हलचल करती हो,
मुझसे अपने आप को,
पूरा तुम करवाती हो,
फिर मेरी पूर्ण कविता बन जाती हो,
मैं तुझसे आस लगाएं बैठी हूं ।
परिचय :- आयुषी दाधीच
शिक्षा : बी.एड, एम.ए....





















