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कविता

हरेली तिहार
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हरेली तिहार

अशोक कुमार यादव मुंगेली (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) बरखा रानी आगे, धान ह बोंवागे। हरियर रंग छागे, किसान के भाग जागे।। भुईयाँ महतारी के होगे सिंगार। चलव मनाबो हरेली तिहार।। अमावस के दिन ह, हे बड़ पावन। बरस के पहिली परब, हे मनभावन।। नांगर, कुदरी के पूजा करहीं संसार। चलव मनाबो हरेली तिहार।। लईका मन बाँस के गेड़ी खपाहीं। रचमच-रचमच चघे, गली-खोर म आहीं।। जम्मों कोती बगरही खुशी के उजियार। चलव मनाबो हरेली तिहार।। गुरतुर गुड़हा चीला ह बिकट मिठाही। माईलोगिन मन उकेरहीं चित्र सवनाही।। कुटकी देबी ह करही जन के उद्धार। चलव मनाबो हरेली तिहार।। बरदिहा, पहटिया मन डारी खोंचे आहीं। लोहार मन चौंखट म खीला गड़ियाहीं।। गोरइंया देवता ह सुनही सबके पुकार। चलव मनाबो हरेली तिहार।। परिचय : अशोक कुमार यादव निवासी : मुंगेली, (छत्तीसगढ़) संप्राप्ति : शिक्षक एल. बी., ...
कविता जीवन में बस लड़ना
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कविता जीवन में बस लड़ना

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** जीवन में जन्म से मृत्यु तक के हर मोड़ पर पड़ता है स्वयं को खुशी गम से पड़ता है लड़ना, सांस चलती रहती है मन कहता है नहीं रुकना धीमे तेज बस, है चलना जीवन में बस है लड़ना भरोसा नहीं कब कहां कैसे खड़ी मुसीबतों मंडराती संबलकर बुद्धि विवेकपूर्ण विचारों से खुद को आसानी से कहीं सँघर्षरत रहकर कहीं दिमागी संतुलन से आखिरकार पड़ता है लड़ना आंधी तूफान ओला बरसात की बिन कहे दिखती है, अद्भुत मार पड़ता है खुद के निर्णयों से सुरक्षित कवज पहनना अधर में पड़े रहने की घड़ी में चाहे अंधकार हो या हो उजाला, जीवन में हरवक्त, जीवन सिखाता बस नाम है जीवन जीवन में बस है, लड़ना परिचय :- ललित शर्मा निवासी : खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) संप्रति : वरिष्ठ पत्रकार व लेखक घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी ...
सिधवा आदमी अउ सोझ गोठ
आंचलिक बोली, कविता

सिधवा आदमी अउ सोझ गोठ

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) सिधवा आदमी अउ सोझ गोठ, फांक मिलय चाहे कड़कड़ नोट, छल-कपट के रस्ता ला छोड़, सच्चाई से सदा रखथें जोड़, मन के भीतर कोनो कसर नइ, बाहर तौने, भीतर घलो वोइ, नइ जानय वो चलाकी के खेल, सबो संग रखथे मया के मेल, अमृत बरोबर ओकर बानी, सरल सुभाव ह ओकर निसानी, दुनिया भले कहय ओला भोला, परम संतोख के ओढ़े हे चोला, मेहनत के ओ खाय कमाय, कुटिल मन ओला कभू नइ भाय, बांटय मया अउ बांटय हांस, ओकर रहनी-कहनी म बिस्वास, झूठ के कोठार ले वो दूर, अपन धरम म रहिथे चूर, पर पीरा ला अपन वो जानय, सबो ला अपन संगी मानय, लइका मन असन निस्छल हांस, चंदन कस महके ओकर सांस, दुनिया म अइसन मनखे हे अनमोल, कोनो नइ लगा सकय ओकर मोल, सिधवा रहि के जियत हे जीवन, ओकरे दुआरे खुश हे भुवन। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी नि...
हिंदी है दिल की धड़कन
कविता

हिंदी है दिल की धड़कन

सुषमा शुक्ला इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** हिंदी है दिल की धड़कन, मातृभूमि की शान, इसके बिना सूना लगे, भारत का हर आँगन। विश्व हिंदी दिवस लाया, नए रंग, नई बहार, सुनो, जागो, बोलो इसे, बनाओ इसका सार। सिंहावलोकन में यह, साहित्य की रोशनी, कवियों की गूँज में, रचा है जीवन की धुन। तुलसी, मीरा, सूर और रसखान की छवि, हिंदी ने सजाई है, संस्कृति की अनूठी कुंजी। शब्दों में है शक्ति, भावों में है जादू, जिससे जुड़कर हर मन में खिलता सुख-सद्गुण का वसु। भाषा सिर्फ शब्द नहीं, यह है आत्मा की छाया, विश्व हिंदी दिवस पर इसकी करें हम गगन-गुंजाया। स्कूल और कॉलेजों में गूंजे इसकी मधुर तान, हिंदी के संग बच्चों का बढ़े ज्ञान। जितनी भी दूरियाँ, मिटा देती यह भाषा, एक करती मनुष्य को, बनाती जग में आशा। आज हम सब करें प्रण, इसे रखें सजग, सशक्त, हिंदी ही है वह दीप, जो जगमग करे स...
हम बलिया वाले बागी है
कविता

हम बलिया वाले बागी है

आनंद कुमार पांडेय बलिया (उत्तर प्रदेश) ******************** है वीर भूमि है अमर भूमि, है अमर यहाँ की गाथा। लगता है अपने हाथों से , इसे सृजित किए हैं विधाता।। मेरा जन्म हुआ उस धरती पर, जहाँ जन्मे ऋषि मुनि त्यागी हैं। हम बलिया वाले बागी हैं।। मेरे बगावती तेवर हैं, हम जुल्म नहीं सह सकते हैं। हैं शेर-ए-दिल बलिया वाले, करते हैं वही जो कहते हैं।। फौलाद भरे हैं सिने में, नश-नश में ज्वाला जागी हैं। हम बलिया वाले बागी हैं।। यही भृगु,वाल्मीकि,परासर, महा ऋषि की तपोभूमि। कोसल साम्राज्य का हिस्सा भी, है ऐतिहासिक युद्ध भूमि।। सन् 47 से पाँच साल, पहले हीं मिली आजादी है। हम बलिया वाले बागी हैं।। नफरत का बीज न बोना है, बस नेक इरादें रखना है। हो गांव-गांव विकसित अपना, सच बोलने से नहीं डरना है।। मत राजनीति के पलड़े पर, तोलो हमने ये ठानी है। हम बलिया वाले बागी है।। यहाँ ग...
शीतल मंद पवन के झोंके
कविता

शीतल मंद पवन के झोंके

प्रेम नारायण मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** शीतल मंद पवन के झोंके, मन आह्लादित कर देते है। गर्मी से राहत दिलवाकर, तन में ऊर्जा भर देते हैं। शीतल मंद ... परमेश्वर है बड़ा दयालु, सृष्टि का पोषण करता है। जाड़ा, गर्मी और वर्षा से, कृषकों को वो तृप्त करता है। धूप,हवा और जल पीने मिट, हम निः शुल्क प्राप्त करते है। शीतल मंद ... सृष्टि का वो सृजनहार है, और वो ही पोषण करता है। पर मनुष्य है बड़ा स्वार्थी, वो अनुचित शोषण करता है। करे सभी का हित परमेश्वर, हम प्रतिदिन विनती करते है। शीतल मंद ... ईश्वर है करुणा का सागर, वो हरपल करुणा करता है। कोई जीव न भूखा सोए, इसकी वो चिंता करता है। जिसपल शरणागत हो पाते, हम उसका दर्शन करते हैं। शीतल मंद ... परिचय :- प्रेम नारायण मेहरोत्रा निवास : जानकीपुरम (लखनऊ) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह ...
कुछ स्त्रियां
कविता

कुछ स्त्रियां

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* कुछ स्त्रियों ने अक्सर मौन को चुना वो चिल्ला भी सकती थीं वो दुनिया को अपनी परेशानी बता भी सकती थी वो अपनी आंखों में आंसू दिखाकर लोगों के दिल में जगह बना भी सकती थी वो चाहती तो कर सकती थी एक जंग का ऐलान फिर से वो चाहती तो फिर कई युद्ध करा भी सकती थी वो चाहती तो छोड़ कर मान मर्यादा समाज की धज्जियां उड़ा भी सकती थी तोड़ कर भरम रिश्ते नातों का वो निकल दहलीज से बाहर जा भी सकती थी वो चुन सकती थी ऐसी कई राहें जहां उसकी मुश्किलें आसान हो जाती जहां उसे किसी को कोई जवाब देना अनिवार्य नहीं होता। वो चाहती तो कर के भंग घर की शांति को कलह क्लेश से घर का माहौल बिगाड़ भी सकती थी मगर फिर भी उसने मौन चुना, क्यों? क्योंकि वो नहीं चाहती युद्ध कोई वो नहीं चाहती कि केवल अपने मन की शांति के लिए वो ...
हृदय में गंगा जमुना सरस्वती
कविता

हृदय में गंगा जमुना सरस्वती

सुषमा शुक्ला इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** हृदय में गंगा की निर्मल धार बहती, सपनों की तर्जनी को छूती रहती। शांति का संदेश लहरों में गूँजता, मन के अंधेरों को रोशनी देती रहती। जमुना की मृदुल धारा जैसे गीत सुनाए, स्नेह और करुणा के मोती हर ओर छाए। मन की प्यास को मीठे जल से भरे, जीवन के हर दुख को सहज ढंग से मेटाए। सरस्वती के स्वर में ज्ञान की लहर है, कविता, कला और शास्त्र की अमर बहार है। हृदय में जब ये तीनों मिल जाएँ, सपनों की दुनिया में उजियारा अपार है। गंगा की शुद्धता, जमुना का स्नेह भरा, सरस्वती का ज्ञान, सबको राह दिखा। मन में समेटे यदि हम इनकी अमृत बूंद, जीवन बने पावन, हर क्षण सुखमय झूम। हृदय की प्यास इन धाराओं से मिटे, जीवन में प्रेम, शांति और ज्ञान मिलते। गंगा जमुना सरस्वती का संग पाकर, मन का मंदिर सदैव दिव्य रूप में खिलते। परिचय :- ...
विद्या
कविता

विद्या

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** कक्षा एक तमाशा शिक्षक एक भक्षक सन्चालक शोषक पालक केवल दर्शक इस कलियुग मैं विद्या के नाम आडम्बर सन्सार एक नाटक और रचयिता ईश्वर। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं आप राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "हिंदी रक्षक राष्ट्रीय सम्मान २०२३" से सम्मानित हैं। घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। ...
निश्चल संवेदना
कविता

निश्चल संवेदना

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** बदलते वक्त के साथ बहुत कुछ बदलता देखा मित्र को शत्रु बनते शत्रु को मित्र बनते देखा। जानता भी नहीं था जिनको उनको अपना बनते देखा और जानता था जिनको11 उनको पराया होते देखा। भागता रहा हमेशा ही अपनों की तलाश में खोजता रहा भावनाओं के द्वार हर किसी के हृदय में। अन्वेषण करता रहा विचारों को समझने वालों की खोजता रहा मन के मीतों को जो समझ जाए मेरे हृदय की हर निश्चल संवेदनाओं को। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻...
अपना पराया
कविता

अपना पराया

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** अपनों में कितने अपने है, वक्त आने पर आपको सबक मिलेंगे..! जख्म है जिस्म में यक़ीनन छुपा कर रख, ये जालिम जमाना है इनके हाथों में मरहम नहीं नमक मिलेंगे..!! दिखावे की इस दौर में पहचान न पाओगे अपना पराया तुम जो नकली है उनके चेहरे पर असली चमक मिलेंगे..।। परिचय :- प्रीतम कुमार साहू, गुरुजी (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) क...
भ्रम का विसर्जन
कविता

भ्रम का विसर्जन

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** हां हम छोड़ेंगे, तुमसे डरना छोड़ेंगे, सदियों का जो गुरूर11 पाल रखे हो मन में वो भ्रम भी तोड़ेंगे, डरना हमारी बपौती नहीं था, वो थी हमारी मजबूरी, अब खाल खींच लेंगे तुम्हारे ओछी अकड़, तुम्हें अंदाजा नहीं हमारे पकड़ की, गुड़ खाने वालों, क्यों है तुम्हें परहेज गुलगुलों से, कर जाते हो ज्यादती कपोत और बुलबुलों से, तुमने जो बांटी थी नफ़रत की दीवारें, तुमने जो रची थी ऊंच-नीच की कतारें, अब उन बेड़ियों को जड़ से उखाड़ रहे हैं, तुम्हारे पाखंड का पन्ना-पन्ना फाड़ रहे हैं, अब न कोई दबा कुचला, न कोई लाचार रहेगा, बराबर का हक होगा, बराबर का अधिकार रहेगा, उठ खड़ा हुआ है अब इंसानियत का सैलाब, मांग रहा है तुमसे सदियों का हिसाब, पहचान लिया है हमने तुम्हारी चालों को, अब ढहा रहे हैं तुम्हारे इन महलों ...
वीरांगना दुर्गावती
कविता

वीरांगना दुर्गावती

अर्चना अनुपम जबलपुर मध्यप्रदेश ******************** चंदेलों की बेटी चण्डी, गढ़-मण्डला की शान की.. चपल, सुंदरी, वीर-बांकुरी दुर्गावती महान थी.... उसकी आँखों के अंगारे, उसके तलवारों के स्वर.. प्राण बचाकर शत्रु भागे हो समक्ष जो रानी गर... योग्य चुनाव स्वयंवर से कर दलपतशाह से ब्याह किया.. पति की सेवा बालक-पालन कुशल नीति से राज किया.. ५२ ताल बनाकर जनता के जीवन अमृत बांटे.. मगर नीति की कौन कहे? वीरों के भाग लिखे कांटे... पति का शोक मनाए कैंसे? कांधे थे दायित्व विकट ... बाजबहादुर आजम खान सरीखे शत्रु जो मरकट.. स्त्री राज करे कैसे? ये बात उसे ना हजम हुई... चुभती मुगलों की आंखों में रानी जैंसे कोई सुई...... हमला करने आते उल्टे मुँह की ख़ाकर जाते थे.. दया-विनय कर जोड़ रानी से अपनी जान बचाते थे.. बार-बार की हार से बाजबहादुर स्वयं अचंभित था... औरत हो...
मित्रता दिवस
कविता

मित्रता दिवस

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** दोस्ती कृष्ण सुदामा सी, नहीं गरीबी अमीरी का भान, मन मिले वही दोस्त बने, प्रेम वही है साथ। दोस्त के मन की बात को, समझ जा जाए वह दोस्त, हर हाल में साथ दे, वही दोस्त मजबूत। छोटे को ऊपर उठाएं, करे बराबर का साथ, नहीं राग नहीं द्वेष जहां, वही दोस्ती का हाथ। गरीबी अमीरी की खाई को, नहीं धोखा नहीं छल, कृष्ण सुदामा सा निश्छल प्रेम, वही दोस्ती का है मेल। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर्स व्यवसाय : बिजनेस वूमेन विशिष्ट उपलब्धियां : १. अंतर्राष्ट्रीय साहित्य मित्र मंडल जबलपुर से सम्मानित २. अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना उज्जैन से सम्मानित ३. राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "साहित्य शिरोमणि अंतर्राष्ट्रीय समान २०...
मित्रता दिवस
कविता

मित्रता दिवस

आशा शर्मा धरमपुरी, इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मित्रों का जीवन में क्या महत्व है। कोई सोचे तो सोचता रह जाता है। जो किसी से भी नहीं मिला, वो मित्र देता है। पैसा भौतिक सुख, और व्यापार देता है। संबंध सामाजिक प्रतिष्ठा, और सम्मान देते हैं। माता-पिता से अनोखा प्यार और स्नेह मिलता है। निस्वार्थ भाव का समर्पण, मात्र, माता-पिता ही देते हैं। पृथ्वी पर उनका स्थान, ईश्वर से भी अधिक मूल्यवान है। इसी प्रकार, एक सच्चे मित्र, का जीवन में होना, सुरक्षा कवच होता है। मित्रता पाना या देना, इस भाव से हटकर त्याग और समर्पण प्रदान करती हैं। संबंधों में एक मर्यादा होती है। परंतु मित्रता अपने मित्र के लिए हृदय से संबंध बनाकर जीती है। बिना कहे हृदय को स्पर्श कर, सुंदर स्वर्णिम भाव संजोती है। मित्रता में छल, कपट, और ईर्ष्या जैसे कलुषित भावों का कोई स्थान नही...
दौड़
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दौड़

महेश बड़सरे राजपूत इंद्र इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** हाँ! सब दम लगा दौड़ रहे हैं रोज दौड़ रहे हैं किसलिए दौड़ रहे हैं सुबह शाम दौड़ रहे हैं पता नहीं क्यों दौड़ रहे हैं बिन मंज़िल के दौड़ रहे हैं सीधे कम, तिरछे बाँके दौड़ रहे हैं धरती और आसमान में दौड़ रहे हैं जिसका ना अंत वही दौड़ दौड़ रहे हैं। पर इस दौड़ से क्या हासिल होगा कितनी शांति है इस दौड़ में कितनो को सुकून मिला कितने हुए संतुष्ट दौड़ के बाद नहीं चाहिए ये अंतहीन अंधी दौड़ ये दौड़ अब ना! परिचय :- महेश बड़सरे राजपूत इंद्र आयु : ४१ बसंत निवासी :  इन्दौर (मध्य प्रदेश) विधा : वीररस, देशप्रेम, आध्यात्म, प्रेरक, २५ वर्षों से लेखन घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमे...
कभी-कभी शब्द
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कभी-कभी शब्द

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* कभी-कभी शब्द हमारी पीड़ा को दर्शा नही सकते और , संवेदनाओं के बहाव को रोक नहीं सकते तब हम कमजोर पड़ जाते हैं अपने हृदय के आगे उस वक्त हमे समझ नही आती कोई भी बात किसी का भी कुछ समझाना व्यर्थ सा हो जाता है तब ऐसा लगता है जैसे मन के भीतर भीतर ही कोई सैलाब उमड़ रहा हो जो डुबो देना चाहता हो अपने सामने आने वाली हर व्यक्ति हर वस्तु हर भावना हर संभावना को हर सोच को हर सलाह को हर उस दूसरे भाव को जो उससे विपरीत हो. व्यथित मन शांत होने से पहले किसी के काबू में नहीं आता जब तक उसके अंदर का उबाल शांत न हो जाए किसी शांत बहती नदी के समान. परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फरवरी निवासी : पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी...
तक दुम
कविता

तक दुम

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** तक दुम... तक दुम.... बीत गई रतिया आये न श्याम तुम.... तक दुम... तक दुम... गर्म सांसों का अहसास मन मोरा भटकाय रहा रमी श्याम तेरे सौरभ में जीवन मेरा महकाय रहा अधर चढे मुरलिया तो करे होश मेरे गुम.... तक दुम.... तक दुम.... रंग रसीला कान्हा मेरा लाया गोटे की अंगिया दिखा दूर से छेड़े मोहे बता कहाँ से ली अंगिया रास रचे जमना तट पे राधा नाचे ठुमक ठुम... तक दुम.... तक दुम.... नटखट नटवर छुप छेड़े दिल भी चुराये माखनचोर डपटे मात तो मन मुस्काये कान पकड़ मनाये चितचोर इक पल ना दिखे मोहन तो मनवा होवै गुम सुम.... तक दुम... तक दुम.... बीत गई रतिया आये न श्याम तुम.... तक दुम... तक दुम... परिचय :- छत्र छाजेड़ “फक्कड़” निवासी : आनंद विहार, दिल्ली विशेष रूचि : व्यंग्य लेखन, हिन्दी व राजस्थ...
ख़ामोशी का फ़ैसला
कविता

ख़ामोशी का फ़ैसला

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** तोड़े हैं गलतफहमियों ने मेरे सारे रिश्ते, जिन्हें मैं समझता था फरिश्ते, अब पता नहीं उन सबको खुन्नस किस बात की थी, शायद कभी उनके दिल में नहीं कदर मेरे जज्बात की थी, जिनकी जबान लड़खड़ाती थी आते ही सामने मेरे, आज बदलते वक्त के साथ उनके तेवर बदल गए, उन जबानों से निकले आग से झुलसा है मेरा तनबदन, मेरे खामोश भरोसे का सरेआम कत्ल कर गए, जो कभी साया बनकर साथ थे, आज वो अजनबी से भी बदतर हैं, हर सफाई यहाँ अब एक गुनाह है, और सुनने वाले सब पत्थर हैं, इसलिए, अब मैंने भी बेजरूरत सफाइयां देने की जरूरत नहीं समझता, जो मुझे समझ न सका, उसे समझाने की जहमत नहीं करता, अब मैंने खुद को समेट लिया है, अपनी खामोशी की चादर में, क्योंकि हर रिश्ते की भीख मांगना अब मेरी फितरत में नहीं। परिचय :-  राजेन...
अंतिम तुमको मेरी पुकार
कविता

अंतिम तुमको मेरी पुकार

 राम राज सिंह उन्नाव (उत्तर प्रदेश) ******************** नवल विटप जो पीट हो रहा उसके तुम हो प्राण। नयन मेघ से आज करा दो अमिय प्रेम रस पान।। प्रकृति सजाती निज आँगन में नित नूतन उद्यान। मेरे मन मधुवन में गुंजित किन्तु विरह का गान।। आज विदाई की बेला है, द्वार खड़े है मेरे कहार। अंतिम तुमको मेरी पुकार।। प्रतिदिन पथ में पुष्प बिछाता साथ मधुर मुस्कान। औचक ही मै खिल जाता हूँ तुम्हे निकट ही जान।। किन्तु मिलन वह एकाकी बस क्षण भर का अवधान। फिर उसी वेदना के क्रंदन का होता नित्य वितान।। सुखद प्रणय की अभिलाषा में, जीवन रण न मै जाऊ हार। अंतिम तुमको मेरी पुकार।। मन में है छवि बसी तुम्हारी और तुम्हारा ध्यान। कभी तो होगा दुःख रजनी का मंगल एक विहान।। स्वाति बूँद बिनु सीप सम अधर–कमल, मुख म्लान। आकर जीवन सुधा पिला दो बन वियोग वरदान।। प्राण हमारे पास तुम्हारे...
शान्त विरह
कविता

शान्त विरह

भारमल गर्ग "विलक्षण" जालोर (राजस्थान) ******************** विरह वेदना शीतल समान, सूर्य तपे तप्त मृगतृष्णा। दुख में सुख की छाया पाई, ज्यों दावानल में शीकर वृष्णा॥ तव स्मृति चंदन चर्चित सी, हृदय तप्त पर लेप समान। विरह हिमगिरि शिखर सा ऊँचा, श्वास पवन बन बहत शीतलान। प्रेम अग्नि दहन करे मन को, विरह बादल बरसे जलधार। जलकर भी न भस्म हुआ मन, कमल सा खिला प्रेम अपार॥ तव अधरामृत सुधा सरीखा, पिपासित स्मृति पान करे। वियोग रात्रि चाँदनी भरी, तारक सम तव नयन चमके॥ दूर तुम पर निकट तुम्हारी, छाया साथ चलती मानो। विरह वेदना शीतल करे, ज्यों सिन्धु लहर तट छू जानो॥ विरह सरिता जल शीतल बहै, प्रेम कमल खिलावत तीर। स्मृति मञ्जरी गुनगुन भौंरे, भाव भ्रमर मधु पीवत नीर। तप्त दिवस में विरह वटवृक्ष, शान्ति छाया देता सघन। वियोग दुख नहीं, प्रेम सिंचन, ज्यों वर्षा करे धरा तरन॥ ...
बारिश की नन्ही बूंदें
कविता

बारिश की नन्ही बूंदें

शिव चौहान शिव रतलाम (मध्यप्रदेश) ******************** बारिश की नन्ही बूंदें गिरतीं उछलती मेरे घर-आंगन में मेरी बिटिया के नन्हे क़दम-सी गर्मी से राहत देती ठंडी-सी लहर रूह में उतरती पेड़ों संग झुमती हवा खिड़कियों के कान बजाती रोशनी से टकराते कीट-पतंगे बिजली की दैत्य गड़गड़ाहट शाम को आशियाने ढूंढते पंछी पहली बारिश में भींगने को करता है, मन। परिचय :-  शिव चौहान शिव (रेल मैनेजर) निवासी : रतलाम (मध्यप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak1...
की बोर्ड
कविता

की बोर्ड

सुषमा शुक्ला इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** "जिंदगी एक कीबोर्ड है, सुर में इसे सजाना होगा, हर अक्षर को संयम देकर जीवन गीत बनाना होगा। जब उँगलियाँ मर्यादा से हर बटन को छू जाती हैं, तब सपनों की मधुर धुनें मन में दीप जलाती हैं। व्यवस्थित जीवन की ताल ही सुंदर राग बनाती है, अनुशासन की हर सरगम मंज़िल तक पहुँचाती है। यदि तारों से छेड़छाड़ हो, स्वर सारे बिखर जाते हैं, अहंकार और अव्यवस्था से रिश्ते भी टूट जाते हैं। कीबोर्ड जैसा संतुलन यदि जीवन में आ जाए, हर दिन भजन-सा पावन बन खुशियों का दीप जलाए। परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : २५ अप्रैल निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एमए राजनीति शास्त्र बरकतुल्लाह भोपाल विश्वविद्यालय लेखन विधा : कविता, हायकु, पिरामिड, लघु कथा लेखन : लेखन के क्षेत्र में कोविद में जीवनसाथी की प्रेरणा से लेखन का कार्य शु...
मन का सुकून
कविता

मन का सुकून

आशा शर्मा धरमपुरी, इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मन तो दौड़ रहा था, जन्म से ही चहुं ओर कुछ रो रोकर खोज रहा था। कहां हूं मैं, कौन हूं, कैसे अपनी पहचान करुं। अलग-अलग हाथों जाकर, अस्तित्व को लेकर सोच रहा था। जब सभी हाथों से यात्रा कर, मां की गोद में आया। बड़े निश्छल और वात्सल्य भाव से, मां ने हृदय‌ से लगाया। सबने देखा तो समझ आया, सारी चंचलता गौण हो गई। रोने वाली आवाज सहसा, गहरी मुस्कान के साथ नींद में खो गई। सुकून का अर्थ है विश्वास, अब उस अबोध मन को, विश्वास हो गया। यही मेरी सुरक्षित थाती है। संसार क्षण-भंगुर है, पर मां की गोद और प्रेम अद्भुत सुकून दे जाती है। संसार में रहते हुए और, संसार से जाने के बाद भी, सुख-समृद्धि और आरोग्य का, आशीर्वाद लुटाती है। हर वस्तु पैसे से खरीदी जा सकती है। अहंकार को भौतिकता बढ़ाती है, मां तो बिना ...
नारी
कविता

नारी

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** नारी का तो रूप निराला, कभी शान्त कभी आग सी ज्वाला। कभी सौम्य ममता की मूरत, कभी प्रेम की सूरत दिखती, कभी अकडपन कभी, लडकपन, कभी रूठना, कभी है हँसना, कभी पल-पल में रोना देखा। कभी मोम सी कोमल रहती, कभी भयंकर क्रोध मे देखी, एक आँख मै आँसु उसके एक आँख मै खुशी है देखी। माता का तो दिल है उजला दूध की नदियाँ आँचल मै बहती, माँ के आँचल में ब्रह्मांड समाया, तभी तो कान्हा सा लाल है जाया, तभी तो राम रूप कौशल्या के घर आया। कभी सूर्य सा तेज है देखा, कभी चन्द्रमा सी शीतलता देखी, कभी गगन सा ह्रदय विशाल, कभी ऊँचाई मन पर्वत सा अपार कभी छूता शिखर आकाश। नारी तू नारायणी, तू ही दुर्गा, तुही काली, तू ही राधा सी सौम्यता (सुन्दर) की खान। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवा...