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गद्य

सिंहस्थ २०१६ का परिदृश्य
संस्मरण

सिंहस्थ २०१६ का परिदृश्य

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** एक दो माह पहले साधु संतों का आगमन अपनी कुटिया व आश्रम की देख रेख के लिए आना चालू हुआ उसमें जो बन सका हम दोनों ने मै और मेरे पतिदेव ने भोजन की सेवा दी अपने हाथों से भोजन बनाती और उन्हें पवाती मन को बहुत शकुन मिलता और आनंद का अनुभव प्राप्त होता और संत सेवा का अवसर हम जैसे तुच्छ प्राणी को मिला। सिहस्थ धीरे-धीरे चालू होना आरंभ हुआ और हम चैतन्य ग्रुप के सदस्य बने सिहस्थ के १५ दिन पहले से ही संतों का आगमन चालू हो गया। बड़े-बड़े जुलूस और पेशवाई निकलने लगी और संतो की अगवानी की व खूब नाच गाना किया फिर देखो साधु संत बहुत खुश, संतों ने खूब नोटों की बारिश की खूब मनमोहक दृश्य रहा यह नजारा हमारे संत नगर का रहा जो मेरे गुरु अवधेशानन्दजी की पेशवाई का था, जो आज भी नयनों के सामने आ जाता है। खूब साधु संतों के दर्शन किए खूब पं...
मेरे शहर के श्रृंगार पर भारी है ड्राई-डे
व्यंग्य

मेरे शहर के श्रृंगार पर भारी है ड्राई-डे

आशीष तिवारी "निर्मल" रीवा मध्यप्रदेश ******************** दो अक्टूबर। यानी राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी का जन्मोत्सव। सरकारी कैलेंडर में इसे गांधी जयंती कहते हैं, और मेरे शहर रीवा लालगांव के कैलेंडर में इसे 'सूखा दिवस' कहते हैं। सरकार कहती है आज अहिंसा दिवस है। शराब की दुकानें बंद रहेंगी। बापू की आत्मा को शांति मिलेगी। पर मेरे शहर के जो प्रबुद्ध पियक्कड़ हैं, वो बापू से भी ज्यादा दूरदर्शी हैं। वे जानते हैं कि सरकार बापू को एक दिन याद करेगी, इसलिए वे बापू से एक दिन पहले ही बापू जयंती का इंतजाम कर लेते हैं। एक अक्टूबर की शाम को ठेके पर ऐसी भीड़ लगती है, जैसे अयोध्या में राम मंदिर का प्रसाद बंट रहा हो। हर हाथ में थैला है, थैले में भविष्य सुरक्षित है। एक-एक बोतल को ऐसे सहेज कर ले जाते हैं जैसे कोई नवजात शिशु को ले जा रहा हो। जो व्यक्ति साल के ३६४ दिन शराब पीकर चौराहे पर पड़ा रहत...
पितृ पक्ष का वास्तविक अर्थ: केवल अनुष्ठान नहीं, कृतज्ञता और संस्कारों का पर्व
आलेख

पितृ पक्ष का वास्तविक अर्थ: केवल अनुष्ठान नहीं, कृतज्ञता और संस्कारों का पर्व

डॉ. प्रीति तिवारी "नमन" गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश) ******************** भारतीय संस्कृति में पितृ पक्ष को अक्सर केवल अनुष्ठान, मृत्यु और श्राद्ध से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन यदि इसके गूढ़ अर्थ को समझें, तो इसे केवल मृत्यु तक सीमित रखना इसके व्यापक भाव को छोटा करने जैसा होगा। पितृ पक्ष वास्तव में जड़ों से जुड़ने, पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और उनके द्वारा दिए गए संस्कारों को अपने जीवन में पुनर्जीवित करने का एक पावन अवसर है। १. हमारी कहानी हमसे शुरू नहीं हुई पितृ पक्ष हमें यह याद दिलाता है कि हमारा अस्तित्व अचानक या अकेले ही निर्मित नहीं हुआ है। हमारी कहानी हमसे शुरू नहीं हुई; हमसे पहले भी कई पीढ़ियाँ थीं। * उन्होंने अपने जीवन में अनगिनत संघर्ष किए। * कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए परिवार बनाए और उन्हें सहेजा। * अपने बच्चों (हमारे माता-पिता और हमारे)...
मुख्य अतिथि बनने की राह– बड़े धोखे हैं इन राहों में
व्यंग्य

मुख्य अतिथि बनने की राह– बड़े धोखे हैं इन राहों में

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** मित्रों, वैसे तो इस जिंदगी में हम सब अतिथि बनकर ही आए हैं, दो दिन के अतिथि जी! लेकिन शायद चार दिन की जिंदगी इसलिए मिली है कि दो दिन अतिथि बनकर काटें और अगर भाग्य ने साथ दे दिया तो बाकी दो दिन मुख्य अतिथि बनकर… तब तो समझिए इहलोक भी तर गया और शायद परलोक में भी आपकी ‘काबिलियत’ का वजन बढ़ जाए, और वहाँ भी किसी देवसभा में मुख्य अतिथि की कुर्सी हथिया लें। लेकिन राह आसान नहीं है, यह आप भी जानते हैं। बड़ी ठन-गन, जाड-जुगाड़, तप-तपस्या लगती हैं इसमें। “बड़े भाग मानुष तन पावा”, पर यह तन ‘माननीय’ तब बनता है जब आप किसी कार्यक्रम में मुख्य अतिथि हो जाएँ। अब शहर में संस्थाएँ कुकुरमुत्तों की तरह उग आई हैं, तो जाहिर है कि उनमें मुख्य अतिथि भी खपने हैं। पहले एक ही मुख्य अतिथि दिन के दो-चार कार्यक्रम निपटा दे...
पर्यावरण
कहानी

पर्यावरण

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा फतेहाबाद, आगरा (उत्तर प्रदेश) ******************** ऋषि वैदिक विद्यापीठ के आचार्य ऋषि कुमार अपने विद्यार्थियों को पर्यावरण के विषय में पढ़ा रहे थे। कक्षा में शांति थी, सभी छात्र-छात्राएं बड़े मनोयोग से एकचित्त होकर आचार्य श्री की बातों को सुन रहे थे, तभी छात्र विवेक बोल उठा, ‘आचार्य श्री हमें पेड़-पौधों के संबंध में वैज्ञानिक दृष्टि से जानकारी दीजिए क्या इनमें भी प्राण शक्ति होती है।’ आचार्य श्री ने विवेक के प्रश्न को ध्यान से सुना और उसकी शंका मिटाने के लिए जानकारी देने लगे । ‘देखो बच्चों ! हाल ही में पोलैंड के वारसा विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने शोध किया और पता लगाया है कि पौधों का भी अपना एक नर्वस सिस्टम होता है। पौधे स्वयं को मौसम के मुताबिक खुद को ढाल लेते हैं। साथ ही अपने अंदर रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास भी कर लेते हैं। ठीक हमारी-तुम्हारी तरह, पेड़-...
सतरंगी दुनिया – ३९
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया – ३९

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ********************  हाथ उसी का पकड़िए, जो आपका साथ कभी ना छोड़े, जैसे 'बिजली का तार।' *अजीब है ये दुनिया- यहाँ बाल सफ़ेद करने में ज़िंदगी निकल जाती है और काले बाल तो आधे घंटे में सफ़ेद हो जाते हैं।* कौन अपना है?, कौन पराया ? यदि आपको परखना है तो मुश्किल वक़्त में उससे पैसे मांग लीजिए। सब अपने-पराए का नशा उतर जाएगा। लोगों का मुँह आप बंद नहीं कर सकते हैं, बेहतर है आप अपने कान बंद कर लीजिए आपकी ज़िंदगी बेहतर हो जाएगी। सुख और दुःख का पैसों से कोई भी संबंध नहीं है, क्योंकि रोने वाले महलों में भी रोते हैं और किस्मत में खुशियाँ हों तो झोपड़ी में भी हँसी गूंजती है। *इंसान का पतन उसी समय शुरू हो जाता है, जब वह अपनों को गिराने के लिए दूसरों से सलाह लेता है।* इंसान को उतने ही पैर पसारने चाहिए, जितनी चादर हो; नहीं तो आजकल मच्छर पैर में काट सकते हैं। किस...
पितरों के स्मरण से अपनी जड़ों तक लौटने का पर्व श्राद्ध पक्ष
आलेख

पितरों के स्मरण से अपनी जड़ों तक लौटने का पर्व श्राद्ध पक्ष

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** क्या हमने कभी ठहरकर यह सोचने की कोशिश की है कि हम कौन हैं? हमारा नाम, हमारा परिचय और हमारी व्यक्तिगत पहचान निश्चित ही हमारी अपनी है, लेकिन हमारे अस्तित्व की जड़ें कहीं बहुत पीछे तक जाती हैं। हमारे भीतर हमारे माता-पिता का अंश है, उनके भीतर हमारे दादा-दादी का, और उनके पीछे अनगिनत पीढ़ियों का वह इतिहास है, जिसने हमारे वर्तमान को आकार दिया। हमारे शरीर में रक्त के साथ उनकी विरासत प्रवाहित होती है, हमारे संस्कारों में उनकी छाप होती है और हमारे जीवन में उनके संघर्षों की अनुगूंज सुनाई देती है। लेकिन आज की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि मनुष्य दुनिया को जानने के लिए बेचैन है, अपने भविष्य को लेकर चिंतित है, पर अपनी जड़ों को जानने के लिए उसके पास समय नहीं। मोबाइल में हजारों तस्वीरें हैं, दुनिया की हर जानकारी एक क्लिक पर उपलब्ध...
विश्वधर्म
आलेख

विश्वधर्म

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा फतेहाबाद, आगरा (उत्तर प्रदेश) ******************** अहिंसा, शांति, प्रेम, शिक्षा और साहित्य के अमर साधक, मानवता के अमर पुजारी महात्मा गांधी जी ने विश्व शांति के लिए जीवन भर कार्य किया। पृथ्वी पर भिन्न-भिन्न धर्म, भाषा- बोली, रंग- रूप हैं, परंतु हैं सभी ईश्वर की कृति। महात्मा गांधी जी ने सभी धर्मों का सम्मान किया। उनका मत था सर्वत्र समता और एकता संसार में स्थापित हो। संसार का सार प्रेम है, जो अहिंसा से जन्मता है। हिंसा से जिसका चित दुःखी हो वह मानव है और यही है दुनिया का असली धर्म है। आज समग्र विश्व आतंकवाद, उग्रवाद, संघर्ष की दहशत में जी रहा है। इसका मुख्य कारण प्रतिशोध, घृणा, धर्मवाद, बदले की भावना है। अन्याय तथा शोषण अपने चरम पर है। आग के बदले आग व आंख के बदले आंख इस मानवी सोच ने मानवता को संकट व अशांति में डाल दिया है। इस समस्या का हल अहिंसा, क्षमा, प्रे...
पहले पाने का जुनून-सबसे आगे होंगे हिन्दुस्तानी
व्यंग्य

पहले पाने का जुनून-सबसे आगे होंगे हिन्दुस्तानी

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** आईफ़ोन १८ लॉन्च हो चुका है। अब प्रतीक्षा है कि भारत में उसे सबसे पहले किसने खरीदा। पिछली बार आईफ़ोन १७ के आगमन पर अंकुश गोयल जी ने रातभर स्टोर के बाहर डेरा डालकर यह गौरव अर्जित किया था। देश को उन पर एवरेस्ट विजय जैसा गर्व हुआ होगा। आखिर फोन खरीदना साधारण काम हो सकता है, लेकिन सबसे पहले खरीदना देश की शान में उसकी सहभागिता। पश्चिम को यह बेचैनी आईफ़ोन ने सिखाई होगी; हम भारतीय इसे जन्मजात लेकर आते हैं। हमें सबसे पहले पहुँचना, पाना, बताना, बाँटना और लूटना भी है। “सबसे आगे होंगे हिन्दुस्तानी” गीत की पंक्ति नहीं, जीवन- पद्धति और जन्मसिद्ध अ-धिक्कार है। सड़क पर हमारी प्रतिभा दिखाई देती है। एम्बुलेंस सायरन बजाती निकले तो बाइकवीर इसे रास्ता देने का संकेत नहीं, दौड़ की चुनौती समझता है। वह घायल से ...
डिजिटल इंडिया का डिजिटल टोल नाका
व्यंग्य

डिजिटल इंडिया का डिजिटल टोल नाका

आशीष तिवारी "निर्मल" रीवा मध्यप्रदेश ******************** डिजिटल इंडिया का डिजिटल टोल नाका या यूं कहिए कि आन लाइन पेमेंट कटौती में सरकार की डकैती। याद है २०१६-१७ वाला वो दौर? मोहल्ले के पान ठेले पर भी एक लड़का आकर स्टिकर चिपका जाता था - "PhonePe/Paytm/BHIM से पेमेंट करें"। चाय की टपरी, ऑटो वाला, सब्जी वाला, सबकी दुकान पर QR कोड ऐसे चमक रहा था जैसे भारत रत्न मिल गया हो। नारा था- कैशलेस बनो, देश बदलेगा। फ्री है, जीरो MDR है, कोई चार्ज नहीं। और हम बन भी गए। जेब में १० रुपये का सिक्का रखना भी हमने पिछड़ापन समझ लिया। अब कहानी का इंटरवल खत्म हुआ है, और सेकंड हाफ शुरू हो रहा है। सरकार और उसके थिंक-टैंक अब नया ज्ञान दे रहे हैं- UPI फ्री कैसे हो सकता है? सर्वर का खर्चा है, मेंटेनेंस है, NPCI को भी तो कमाना है। अरे? NPCI? वो संस्था जो खुद सालाना १००० करोड़ से ज्यादा के मुनाफे में बैठी ...
सीट नंबर ७ : भारतीय रेल का अवैतनिक कार्यालय
व्यंग्य

सीट नंबर ७ : भारतीय रेल का अवैतनिक कार्यालय

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** भारतीय रेल में जब आप थर्ड एसी की टिकट बुक करते हैं तो आपसे बड़ी विनम्रता से पूछा जाता है, लोअर चाहिए या अपर, मिडिल चलेगी या साइड लोअर? यह प्रश्न लोकतंत्र का भ्रम पैदा करता है। असल में फैसला पहले ही हो चुका होता है। और अगर आपकी किस्मत ने ज़रा भी आपकी लेनी चाही है, तो वह फैसला होता है सीट नंबर ७ ... सीट नंबर ७ कोई साधारण सीट नहीं है। यह रेल व्यवस्था की काली स्याह आत्मा है। यह वही सीट है जो कोच के दरवाज़े से सटी होती है, जहाँ से पूरी बोगी की दुखती नब्ज़ गुजरती है। इसे देखकर लगता है कि रेलवे ने इसे यात्री के लिए नहीं, बल्कि व्यवस्था के दुरूपयोग के लिए बनाया है। अगर आपकी टिकट वेटिंग या आरएसी में रही है, तो समझ लीजिए कि आपका अंतिम पड़ाव यही सीट है। टीटी के लिए यह सीट पनौती नहीं, संभावनाओं क...
विश्व मंगल की कामना
आलेख

विश्व मंगल की कामना

माधवी तारे लंदन ******************** आज के समय में समाज के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि युवा पीढ़ी का ध्यान सही दिशा में कैसे लगाया जाए। कई लोग विदेशी जीवनशैली को अपनाकर स्वयं को आधुनिक मानते हैं, किंतु इस कारण भारतीय संस्कृति और सनातन परंपराओं पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। हर घर में यह स्थिति दिखाई देती है कि कई बार वृद्धजनों की बात को युवा नहीं सुनते और दादा-दादी को पुराने जमाने का बता कर अनसुना कर देते हैं. लेकिन ऐसे समय में कई लोग और संस्थाएं ऐसी हैं जो हमारी सनातन परंपरा को बचाने के लिये सतत प्रयत्नशील हैं। महिलाओं और बच्चों को सुरक्षा देने के लिये ये संस्थाएं जी जान लगा कर काम कर रही हैं। ऐसी ही एक संस्था है विश्वमांगल्य उसके एक सम्मेलन में सौभाग्य से मुझे आमंत्रित किया गया था। मांगल्य जैसा संस्कृत शब्द पढ़ कर वैसे भी मेरी जाने की इच्छा प्रबल हो गई थी। संस्था के दस साल पूरे होने...
उर्मिला का विश्वास
कथा

उर्मिला का विश्वास

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा फतेहाबाद, आगरा (उत्तर प्रदेश) ******************** लक्ष्मण जीवन और मृत्यु के बीच की स्थिति मूर्छित अवस्था में थे। उन्हें मेघनाद ने युद्ध में घायल कर दिया था। रामभक्त हनुमान वेद्यों के आदेशानुसार संजीवनी बूटी लेने हिमालय चले गये। लौटते समय अयोध्या से गुजरे तो भरत जी ने राक्षस समझ कर बाण मार दिया। जय श्री राम के उच्चारण से हनुमान व भरत की आपसी शंका दूर हुई। सारा वृत्तांत हनुमान जी ने अयोध्या वासियों को कह सुनाया। सभी दुःखी हो गये सिवाय उर्मिला को छोड़कर... हनुमान जी से उर्मिला की प्रसन्नता देखी न गई। हनुमान जी बोले- ‘देवी! तुम्हारा पति मृत्यु के साये में है। सूर्य उदय होते ही सूर्यकुल का दीपक बुझ जायेगा और तुम विधवा हो जाओगी। तुम्हें तनिक भी अपने पति के प्राणों के संकट की चिंता नहीं। तुम्हारा चेहरा तनिक भी न मुरझाया।’ उर्मिला ने हनुमान की बातों को सुनकर जो ...
किताबों का रिक्शा
सत्यकथा

किताबों का रिक्शा

माधवी तारे लंदन ******************** शहर की गलियों में रघु का रिक्शा रोज़ सुबह सबसे पहले दिखाई देता था। नीली पेंट उधड़ी हुई थी, पुरानी सी रिक्शा थी लेकिन थी साफ सुथरी। ऐसे ही एक दिन एक मैडम उनके रिक्शे में बैठीं। कलफ लगी, सूती लेकिन साफ साड़ी और शालीन व्यक्तित्व। मैडम ने रास्ते में रघु से बहुत बातें की, रघु सारी बातों का जवाब दे रहा था। जब मैडम नीचे उतरी तो रघु ने कहा “मैडम रुकिये, मुझे आपको कुछ देना है।” रास्ते में हो रही आध्यात्म की बातों के आधार पर रिक्शा की सीट के नीचे से उसने ईशावास्य उपनिषद पर एक किताब निकाली औऱ मैडम को दी। मैडम हैरान रह गई कि रिक्शा चलाने वाला एक साधारण, शायद अनपढ़ आदमी कितनी समझ रखता है। मैडम ने हैरानी से पूछा, आपके पास इतनी किताबें हैं? आप पढ़ते हैं ...? रघु कुछ देर चुप रहा फिर कहा, “मैडम, मैं यह सोचकर किताबें लोगों को देता हूँ कि जो पढ़ा-लिखा दिखता है, वही कि...
११ सितंबर १८९३- शिकागो के मंच से विश्व ने सुना भारत का शाश्वत दर्शन
आलेख

११ सितंबर १८९३- शिकागो के मंच से विश्व ने सुना भारत का शाश्वत दर्शन

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** शिकागों दिवस पर विशेष - कभी-कभी इतिहास में कोई एक क्षण सदियों की मौन साधना को स्वर दे देता है। ११ सितंबर १८९३ का दिन ऐसा ही एक क्षण था। अमेरिका के शिकागो में विश्व धर्म संसद का विशाल मंच सजा था और दुनिया के अनेक धर्मों एवं सभ्यताओं के प्रतिनिधि वहाँ उपस्थित थे। उसी मंच पर भारत का एक युवा संन्यासी खड़ा हुआ। उसके पास न कोई राजनीतिक सत्ता थी, न किसी साम्राज्य का समर्थन और न पश्चिमी दुनिया में कोई स्थापित पहचान। उसके पीछे था तो केवल भारत का हजारों वर्षों का चिंतन, उसकी तपस्या से अर्जित दार्शनिक दृष्टि और समूची मानवता को एक परिवार मानने वाली उसकी सांस्कृतिक चेतना। जब उस संन्यासी ने कहा “अमेरिका के मेरे भाइयों और बहनों” तो यह केवल एक संबोधन नहीं था, यह भारत की आत्मा का विश्व से आत्मीय संवाद था। उस दिन स्वामी विवेकानंद...
समझौता
कहानी

समझौता

चित्रलेखा व्यास कानोड़, उदयपुर (राजस्थान) ******************** विंध्याचल की पहाड़ियों पर उस दिन धूप कुछ फीकी-सी थी। मंदिर की सीढ़ियों के बाहर लाजो चुपचाप बैठी थी। सामने घंटियाँ लगातार बज रही थीं- टन...टन...टन... हर एक घंटी की आवाज़ जैसे उसके भीतर उतरकर किसी बंद दरवाज़े को खटखटा रही थी। लाजो मिर्जापुर की रहने वाली थी। उम्र बहुत नहीं थी, मगर आँखों में जाने कितने मौसम उतर चुके थे। वह मंदिर के बाहर बैठी उन घंटियों को सुनते हुए सोच रही थी- क्या ईश्वर के घर में भी किसी लड़की की इच्छा की कोई आवाज़ पहुँचती है? तभी मंदिर के भीतर से पुजारी ने उसे आवाज़ दी। “बेटी, दर्शन कर लो।” वह उठी। माथे पर आँचल खींचा और माँ विंध्यवासिनी के सामने जा खड़ी हुई। आँखें बंद कीं तो मन में कोई प्रार्थना नहीं थी, केवल एक प्रश्न था- “माँ, मेरी जिंदगी का रास्ता मुझे चुनने दोगी?” दर्शन करके वह गंगा किनारे च...
तुम कब वापस जाओगे मेघराज, एक धरा-नागरिक की दारुण पुकार
व्यंग्य

तुम कब वापस जाओगे मेघराज, एक धरा-नागरिक की दारुण पुकार

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** हे बूंदों के बादशाह, बरसाती महाराज! यह तीसरा महीना है,धरती को सिंचित, पल्लवित, प्लावित और परेशान करते हुए। अब बस भी करो। धरा को थोड़ी धूप चाहिए, मनुष्य को थोड़ी राहत और गृहिणियों को बेसन-तेल का कोटा। तुम्हारी उमड़-घुमड़, ताबड़तोड़ बौछारें अब रोमांच नहीं, विशुद्ध भय पैदा कर रही हैं। हे मेघराज, आखिर तुम कब जाओगे? माना, तुम हमारे ‘अतिथि’ हो, स्वागत में कवियों ने गीत गाए, चारण-भाटों ने छंद रचे, मेंढक-मेंढकियों का ब्याह कराया, शिवलिंग डुबोए गए, गधे गुलाबजामुन खाकर, अघाकर हल चलाने उतारे गए। और हम जैसे व्यंग्यकारों ने तुम्हारी ज़िद्दी पुरवाइयों पर तीर छोड़े, ताकि तुम प्रसन्न होकर धरती को तृप्त कर दो। पर तुम तो उस मेहमान की तरह ठहर गए हो जो “कल जाऊँगा, परसों पक्का” कहते हुए बरामदे में स्थायी न...
मौर्य काल में भोजन, पाककला और भोजन नियम
आलेख

मौर्य काल में भोजन, पाककला और भोजन नियम

भीष्म कुकरेती मुम्बई (महाराष्ट्र) ******************** भारत में भोजन इतिहास भारतीय इतिहास का मौर्य काल (लगभग ३२२ ईसा पूर्व से १८५ ईसा पूर्व) न केवल राजनीतिक सुदृढ़ता, प्रशासनिक दक्षता और विशाल साम्राज्य के लिए जाना जाता है, बल्कि यह संस्कृति, कला, अर्थव्यवस्था और खान-पान के विकास का भी एक स्वर्ण युग था। मौर्य साम्राज्य के दौरान भारतीय समाज में कृषि का अभूतपूर्व विस्तार हुआ, व्यापारिक मार्ग सुदृढ़ हुए और देश-विदेश से सांस्कृतिक आदान-प्रदान बढ़ा। इसका सीधा प्रभाव तत्कालीन जनजीवन, भोजन की विविधता, पाककला (Culinary Arts) और भोजन से जुड़े सामाजिक तथा धार्मिक नियमों पर पड़ा। इस काल की भोजन व्यवस्था और पाककला की जानकारी हमें मुख्य रूप से कौटिल्य (चाणक्य) द्वारा रचित 'अर्थशास्त्र', यूनानी राजदूत मेगास्थनीज के यात्रा वृत्तांत 'इंडिका', अशोक के शिलालेखों तथा उस काल के बौद्ध और जैन ग्रंथों से प्र...
जब जीवन हारने लगे, तब श्री कृष्ण का जीवन पढ़िए
आलेख

जब जीवन हारने लगे, तब श्री कृष्ण का जीवन पढ़िए

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** आज मनुष्य के पास पहले से अधिक साधन हैं,लेकिन शायद पहले से कम धैर्य। उसके पास संवाद के लिए अनेक माध्यम हैं, फिर भी भीतर का अकेलापन बढ़ता जा रहा है। छोटी-सी असफलता उसे भीतर तक हिला देती है, रिश्तों में आया मामूली तनाव उसे निराश कर देता है और जीवन की कठिन परिस्थितियों के लिए डिप्रेशन जैसे शब्द सहजता से हमारी बातचीत का हिस्सा बन गए हैं।ऐसे समय में प्रश्न यह नहीं कि कठिनाइयां क्यों आती हैं। प्रश्न यह है कि कठिनाइयों के बीच मनुष्य स्वयं को कैसे संभाले? इस प्रश्न का उत्तर हजारों वर्ष पुराना है, श्रीकृष्ण के जीवन में। श्रीकृष्ण को यदि केवल मंदिर में विराजमान भगवान के रूप में देखा जाए तो हम उनके व्यक्तित्व का एक छोटा-सा हिस्सा ही देख पाएंगे। कृष्ण को समझना है तो उनके जीवन को देखना होगा। एक ऐसा जीवन जिसमें जन्म से लेकर अं...
मानसून का सरकारी आवंटन
व्यंग्य

मानसून का सरकारी आवंटन

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** “सोचिए, अगर ऊपरवाले ने मानसून का ज़िम्मा नीचेवाले सरकारी तंत्र को सौंप दिया होता तो...?” सरकारी तंत्र! बाप रे बाप... यह व्यवस्था नहीं, कोई चमत्कारी प्रयोगशाला लगती। बारिश की बूँदें नहीं, नोटशीटें टपक रही होतीं-एक दफ़्तर से दूसरे दफ़्तर तक! मानसून सीधे कैसे आ जाता? पहले फ़ाइलों की मार्किंग होती, फिर रीमार्किंग। अतिरिक्त टिप्पणियाँ लगतीं, और फ़ाइलों की घुड़दौड़ शुरू हो जाती - तहसील से पटवारी, पटवारी से एस.डी.एम., एस.डी.एम. से कलेक्टर और कलेक्टर से लेकर चायवाले तक सभी से सुझाव लिए जाते। जनमत सर्वेक्षण कराए जाते। फिर नेता लोग यह तय करते कि किस क्षेत्र में उन्हें कितने वोट मिले हैं - उसी अनुपात में वहाँ मानसून आवंटित होता। टेंडर भरे जाते, सिफ़ारिशी पत्र लगाए जाते, उन पर वजन डाला जाता। फिर जा...
सतरंगी दुनिया- ३८
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया- ३८

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** *डकार और गैस एक ही माँ के २ बेटे हैं, मगर गैस ने गलत रास्ता चुन लिया है, इसलिए उसकी कोई इज्जत नहीं करता है।* बहुत आसान है किसी पर अंगुली उठाना, परंतु बहुत मुश्किल है किसी को उठाने के लिए उसकी अंगुली पकड़‌ना। ज़िंदगी में इतनी गलतियाँ न करें कि पेन्सिल से पहले रबर घिस जाए और रबर को इतना मत घिसिए कि ज़िंदगी के पेज ही फट जाएं। रंग छोड़ते कपडे और रंग बदलते इंसान चाहे कितने ही ब्रांडेड हों, उनकी कोई इज्जत नहीं करता है। किसी के गुस्से को उसकी नफरत समझने की भूल ना करें, क्योंकि गुस्सा वही करता है; जो आपकी फिक्र करता है। स्टीकर और विश्वास दोनों एक समान है। दोबारा जरूरत पड़ने पर काम कम करते हैं। 'पत्थर' तब तक सलामत है, जब तक वो पर्वत से जुड़ा है। 'पत्ता' तब तक सलामत है जब तक वो पेड़ से जुड़ा है और 'इंसान' तब तक सलामत है, जब तक वो...
रक्षा-सूत्र
लघुकथा

रक्षा-सूत्र

डॉ. राम रतन श्रीवास बिलासपुर (छत्तीसगढ़) ******************** "राधे" को सुबह-सुबह आँगन में खड़ा वह आम का पेड़ आज कुछ अधिक ही अपना-सा लग रहा था। उसकी शाखाओं पर चिड़ियाँ चहचहा रही थीं और पत्तियाँ हवा के साथ ऐसे झूम रही थीं, जैसे किसी उत्सव की तैयारी कर रही हों। "राधे" पेड़ के तने पर हाथ फेरा और धीरे से बोला.... “तूने हमारे परिवार को वर्षों से छाया देते आ रहे हो!... सु स्वादिष्ट फल देते हो!... साँसों के लिए शुद्ध हवा दे रहे हो!… आज मैं तेरी भी रक्षा का वचन देता हूँ।” "राधे" ने आम की कलाई पर (राखी) रक्षा सूत्र बाँधा और मन में एक अनोखा बंधन का अहसास.... पास खड़ा "आर्यन" बेटा आश्चर्य से पूछ बैठा!... “पापा! राखी तो भाई की कलाई पर बाँधी जाती है, फिर पेड़ को क्यों?” "राधे" मुस्कुराया!.. पेड़ की ओर देखते हुए बोला... “बेटा!.. जो हमारी रक्षा करे, उसकी रक्षा करना भी तो हमारा धर्म है। बहन-भाई...
सतरंगी दुनिया- ३७
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया- ३७

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ********************  ईमानदारी से काम करने वालों के शौक भले पूरे ना हों, लेकिन नींद जरूर पूरी होती है। पैसा सिर्फ आपकी लाईफ-स्टाईल बदल सकता है- दिमाग, नीयत और किस्मत नहीं। इस दुनिया में आपकी कद्र तब तक है, जब तक आप किसी की जरूरत बने रहते हैं। जिस दिन जरूरत खत्म हो जाती है, उस दिन कई रिश्तों का असली रंग भी सामने आ जाता है। *हमारी पड़ोसन ने अपने घर में एक बोर्ड लगा रखा था, जिस पर लिखा था- कृपया अपनी चप्पलों के साथ-साथ अपनी गलत सोच... गलत हरकत... सास-बहू... देवरानी-जेठानी और ननद की चुगली... बाहर ही उतार कर आएं और एक महत्वपूर्ण बात- अपनी तिरछी नजरों से मेरे पति को ना देखें, वो बहुत सीधे हैं; किसी के भी बहकावे में आ जाते हैं।* हमें वो ही लोग अच्छे लगते हैं, जो हमारी हाँ में हाँ मिलाते हैं। जो सही को सही और गलत को गलत बोलते हैं, ऐसे लोग सबकी ...
राखी का दीप
लघुकथा

राखी का दीप

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** "भैया तुम कितनी देर में आओगे?" आता हूँ जरा बिजी हूं। "भैया बहुत देर हो गई, अब तो आ जाओ।" "ट्रिन ट्रिन......" "........" "ट्रिन ट्रिन......" "........" "अरे तुम क्यों परेशान हो रही हो? तुम्हारा मिनिस्टर भाई विधवा आश्रम की महिलाओं से राखी बँधवाने में व्यस्त होगा न?" पति ने भाई को राखी बाँधने के लिए व्याकुल हो रही अपनी पत्नी से कहा, जो बार-बार भाई को फोन कर रही थी। "दरअसल बात यह है कि हम दोनों साल भर के अंतर वाले बहन-भाई हैं। साथ ही खेल-कूदकर बड़े हुए हैं। चूँकि भाई शुरू में छात्र राजनीति में रहा। कालेज का प्रेसीडेंट रहा, फिर छात्र संगठनों में शामिल होकर पार्टी पोलिटिक्स में चला गया...और फिर विधायक बनकर मिनिस्टर बन गया, पर भैया ने मुझे वचन दिया था कि चाहे कुछ भी हो जाए, कैसे भी हालात हों, वह मुझसे राखी बँधवाने मेरे ...
पुरुष्कार का दर्शन शास्त्र
व्यंग्य

पुरुष्कार का दर्शन शास्त्र

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** हर ‘पुरस्कार’ को नमस्कार है… पुरस्कार- नाम ही ऐसा है, जैसे पुरुषत्व की विजयघोषणा हो। सुनते ही लगता है मानो पितृसत्ता का तमगा पहन लिया हो। अब तो महिलाएं भी कहने लगी हैं- “ये पुरस्कार क्यों? कुछ तो ‘महिलाकार’ जैसा होना चाहिए!” सही पूछें तो कई साहित्यकारों को पुरुष्कार की फांक लेते ही साहित्यिक मर्दानगी के लक्षण प्रकट होने लगते हैं! बिना पुरस्कार के देखो न साहित्यकार की हालत, बिल्कुल नामर्दी के शिकार मरीज़ की तरह, जो अपनी मर्ज़ का इलाज ढूंढते हुए इधर-उधर काशी, कलकत्ता, कराची, हर चांदसी, देसी और नकली आयुर्वेदिक दवाखाने की खाक छान चुका है । मिल ही जाएंगे ऐसे लोग... हाँ, आजकल इसका इलाज शर्तिया गारंटी के साथ पुरस्कार की चटनी-चूर्ण से होने लगा है! जगह-जगह लग गए हैं पुरुष्कार के ऐसे ही लंगर, खु...