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गद्य

जन सेवक- जनता
व्यंग्य

जन सेवक- जनता

कमल किशोर नीमा उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** हम जनता है, जन सेवक बनाना हमारा मौलिक अधिकार है ।जन सेवक बनने के लिए किसी को भी कोई विश्व विद्यालय की डिग्री की आवश्यकता नहीं है। जन सेवक बनने की शुरुआत अपने क्षेत्र मे छोटे-छोटे अपराधों जैसे कोई मारपीट या छेड़खानी आदि से शुरू कर सकते है। आप को कुछ माह की जेल भी हो सकती है लेकिन आपको कोई चिंता नहीं करनी चाहिये क्योंकि जेल मे रहकर वहाँ का अनुभव आप को आगे भी काम आयेगा। जेल मे रहने से आपकी पहचान पुलिस महकमे के साथ साथ बड़े अपराधियों से भी होगी जिससे आप को हौसला मिलेगा और आप आगे बढ़ेंगे। आप बड़े अपराध जेसे हप्ता वसूली शहर के बड़े लोगों को डराने, भू माफियाओं आदि के काम से आपका नाम अख़बारों मे व टीवी चैनलों के माध्यम से फेमस होगा। यदि आप लोगों की भावनाएं भड़का कर दंगा फसाद करवाते है तो इससे भी आप को कोई परेशानी नहीं होगी क्योंकि पुलिस आ...
मेरी माँ ने ही मुझे कविता-प्रेम दिया
संस्मरण

मेरी माँ ने ही मुझे कविता-प्रेम दिया

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** मैं मध्यप्रदेश के गुना जिले (अब अशोकनगर) की चन्देरी तहसील के गाँव प्राणपुर का रहने वाला हूँ। छोटा-सा गाँव है। तब तो बहुत ही छोटा था।उन दिनों गाँव में भौतिक तरक्की तो बिल्कुल नहीं थी, पर प्रेम व अपनापन बहुत था। लोग बहुत ही हिल-मिलकर रहते थे। मेरे पिताजी शासन की राजस्व सेवा में थे, और माताजी गृहिणी थीं। हालांकि माताजी मात्र आठवीं तक ही पढ़ी थीं, पर उनकी नोलेज ज़बरदस्त थी। रामायण, महाभारत, वेद-पुराणों सबका उन्हें गहरा ज्ञान था। मुझे वे पौराणिक गाथाएँ व प्रसंग सुनाती रहती थीँ। उन्हें भजन व कविताएं भी बहुत सारी याद थीं। माँ ख़ुद भी कविताओं को गढ़ लेती थीं, और तुक मिलाकर मुझे सुनाया करती थीं। जिससे मेरा सहज ही कविता के प्रति अनुराग हो गया। माँ के निर्देश पर मैं रोज़ाना शाम को रामायण भी पढ़ता था, जिससे मुझे धर्म के प्रति अनु...
सतरंगी दुनिया- २२
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया- २२

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** *ज़िंदगी को ठंड और घमंड दोनों से बचाकर रखना चाहिए, क्योंकि दोनों ही परिस्थितियों में आदमी अकड़ जाता है।* हम लोग घर के दरवाजे पर शुभ-लाभ लिखते हैं। केवल शुभ-लाभ लिखने से कुछ नहीं होगा। शुभ विचार रखिए अपने लिए भी और दूसरों के लिए भी, फिर लाभ ही लाभ होगा। भगवान ने हर इंसान को किसी वजह से बनाया है, इसलिए खुद को स्पेशल समझना शुरू कर दो। *वाणी और विचार ये दोनों प्रोडक्ट हमारी खुद की कम्पनी के हैं। इनकी क्वालिटी जितनी अच्छी रखेंगे, कीमत उतनी ही ज्यादा मिलेगी।* भिखारी भी कभी-कभी विशेष जवाब देकर सोचने को मजबूर कर देते हैं। एक व्यक्ति प्रतिदिन भिखारी को दस रुपए देता था। अचानक पिछले कुछ दिनों से उसने भिखारी को एक रूपया प्रतिदिन देना शुरू कर दिया। भिखारी ने कारण पूछा तो उस व्यक्ति ने बताया कि अब उसकी शादी हो गयी है। तब भिखारी न...
नेताजी कर्मदास की कैंची लीला
व्यंग्य

नेताजी कर्मदास की कैंची लीला

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** नेताजी कर्मदास बड़े कर्मयोगी हैं। कर्म और कर्मफल, दोनों में उनका अटूट विश्वास है। बस फर्क इतना है कि उनके कर्म का केंद्र न राष्ट्र है, न जनकल्याण, वे तो एक ही महान कर्म के लिए अवतरित हुए हैं, वो कर्म है ‘फीता काटना।‘ दिन में दो-चार फीते न कटें तो उनकी उंगलियाँ ऐसे फड़कती हैं जैसे बिना दाना देखे कबूतर बेचैन हो उठे। जेल हो या जिम, अस्पताल हो या शोरूम,बस मंच सजा हो, फीता तना हो और कैमरे तैयार हों, नेताजी अपने कर्म-प्रदर्शन के लिए तत्पर खड़े मिलेंगे। उनके अनुसार फीता काटना पतंग के पेंच लड़ाने से भी अधिक कौशलपूर्ण कार्य है। वे न सुई से, न तलवार से, सिर्फ कैंची से, एक दिन राजनीति की चाँदी काटने का सपना संजोए बैठे हैं। एक बार किसी कार्यक्रम में उन्हें भोंथरी कैंची थमा दी गई। फीता झटके से न कटा ...
कैसे बताऊँ …?
संस्मरण

कैसे बताऊँ …?

डॉ. आभा माथुर उन्नाव (कानपुर) ********************  न जाने मुसीबतें स्वयं मुझे ढूंढ लेती हैं या मैं उन्हें बुला लेती हूं. यह घटना १९६५ या १९६६ की है । मैंने १९६५ में लखनऊ विश्वविद्यालय से एम्.एड किया था. आगे एम .एड. करने की इच्छा थी परंतु लखनऊ विश्वविद्यालय से एम.एड नहीं करना चाहती थी क्योंकि लखनऊ विश्वविद्यालय से एम्.एड. करने वालों को अधिकतर तृतीय श्रेणी में उत्तीर्ण होते देखा था। इसी ऊहापोह में एडमिशन का समय निकल गया। मैंने अगले वर्ष एम्.एड करने का मन बना लिया था, तभी एक परिचित लड़की मेरे पास आई। उसने बताया कि एक जूनियर हाई स्कूल उसी वर्ष हाई स्कूल कक्षाएं चालू करना चाहता था। परंतु उन्हें ऐसी शिक्षिका नहीं मिल रही थी जो ट्रेंड भी हो और उसके पास बी.ए. में अंग्रेजी विषय भी हो। बता दूं कि वह छोटा नगर अर्थात बदायूं था। उस जमाने में वहां केवल इंटरमीडिएट तक कॉलेज उपलब्ध थे। अतः अच्छ...
लोककल्याण से टीआरपी तक : पत्रकारिता का देव ऋषि नारद से विचलन
आलेख

लोककल्याण से टीआरपी तक : पत्रकारिता का देव ऋषि नारद से विचलन

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** सूचना के विस्फोट के इस दौर में पत्रकारिता पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली और प्रभावशाली माध्यम बन चुकी है। स्मार्टफोन की स्क्रीन पर उभरती एक खबर कुछ ही पलों में जनमत तैयार कर देती है, सरकारों पर दबाव बना देती है और समाज की दिशा तक तय कर देती है। लेकिन इस तेज़, तात्कालिक और प्रतिस्पर्धा पत्रकारिता के बीच एक मूल प्रश्न बार-बार उभरता है, क्या हम अपने मूल उद्देश्य से भटक रहे हैं? यदि भारतीय परंपरा के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो संचार और संवाद की अवधारणा कोई नई नहीं है। हमारे पुराणों में देवऋषि नारद जी का चरित्र इस बात का प्रमाण है कि सूचना का आदान-प्रदान केवल तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक उत्तरदायित्व था। नारदजी केवल संदेशवाहक नहीं थे, वे संवाद के वाहक थे। उनका हर हस्तक्षेप किसी न किसी रूप मेंलोककल्याण से जुड़ा होता ...
यादों का घर
कहानी

यादों का घर

देवेन्द्र देव "मिर्जापुरी" बुलंदशहर (उ.प्र.) ******************** शाम ढल चुकी थी। आकाश में धूप का अंतिम रंग जैसे धीरे-धीरे सिमटकर अँधेरे में खो रहा था। घर के आँगन में खड़ा पुराना नीम का पेड़ अब भी वैसे ही खड़ा था, पर उसके नीचे बैठने वाला आज कोई नहीं था। अजय बरामदे में रखी उसी कुर्सी पर बैठा था, जहाँ कभी उसके पिता जी अख़बार पढ़ते हुए उसे जीवन की बहुत-सी छोटी-छोटी सीखें दिया करते थे। आज कुर्सी खाली थी, पर उस पर जैसे अब भी किसी के होने का अहसास बाकी था। हवा का एक झोंका आया और पास रखे अख़बार के पन्ने अपने आप फड़फड़ा उठे। अजय ने चौंककर देखा। “पिताजी…?” उसके होंठों से अनायास निकल पड़ा। कुछ क्षण के लिए उसे लगा जैसे वही परिचित आवाज सुनाई देगी- “अरे, ऐसे चौंकते क्यों हो? बैठो, कुछ बातें करते हैं…” पर वहाँ सिर्फ खामोशी थी। पिता जी को गए हुए कई महीने बीत चुके थे, लेकिन हर शाम...
उत्तर वाहिनी नर्मदा परिक्रमा
संस्मरण

उत्तर वाहिनी नर्मदा परिक्रमा

माधवी तारे लंदन ******************** उत्तरवाहिनी नर्मदा की परिक्रमा करते हुए मन लहरों की तरह हिलोरें ले रहा था। हर आती जाती लहर के साथ स्मृतियां कौंध रही थी। १९९८ से मैंने पारिवारिक कारणों से जो विदेश यात्राएं शुरू की वह आज भी अनवरत जारी हैं। करीब इतने ही वर्षों से मैं मन में नर्मदा परिक्रमा का सपना लिये हुए थी। लेकिन इतने वर्षों में लंदन, पेरिस, बर्लिन जैसे अनेक मशहूर शहर और देश देखे लेकिन नर्मदा मैया अपने पास बुलाने को तैयार नहीं थी। कभी-कभी मन को निराशा घेर लेती कि शायद यह स्वप्न कभी पूरा नहीं होगा। कभी यात्रा की तिथियां पता चलने से पहले ही फुल हो जातीं तो कभी किसी और कारण से जा नहीं पाती। इस बार फरवरी में फिर जाने का मौका लगा था लेकिन जब तक मैं हां कह पाती जगहें भर गई थी। फिर मैंने गुरु महाराज से कहा कि अब आप ही मेरा सपना पूरा करने में मेरी मदद कर सकते हो। यह कह कर मैंने महाराज के ...
हिमाचल प्रदेश और केरल की संस्कृति, भूगोल और परंपराओं की तुलनात्मकता
आलेख

हिमाचल प्रदेश और केरल की संस्कृति, भूगोल और परंपराओं की तुलनात्मकता

मन्नत रंधावा कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** हिमाचल प्रदेश और केरल भारत के दो विविध राज्यों हैं, जहाँ पहाड़ी ठंडक और उष्णकटिबंधीय समुद्र तट अपनी-अपनी संस्कृति, भूगोल और परंपराओं को समृद्ध करते हैं। ये राज्य प्रकृति, त्योहारों और लोक जीवन से भरे हैं। हिमाचल प्रदेश (उत्तर भारत) और केरल (दक्षिण भारत) की संस्कृति और भूगोल एकदम भिन्न हैं। हिमाचल ठंडी घाटियों, ऊनी वस्त्रों, सेब के बागानों और लोक नृत्यों (नाटी) के लिए जाना जाता है, जबकि केरल गर्म तटीय जलवायु, सूती परिधानों, नारियल/मसालों और शास्त्रीय कलाओं (कथकली) का केंद्र है। दोनों राज्य उच्च साक्षरता और पर्यटन के लिए प्रसिद्ध हैं। हिमाचल प्रदेश और केरल की भौगोलिक स्थिति :- हिमाचल प्रदेश हिमालय की गोद में बसा पहाड़ी राज्य है, जिसका क्षेत्रफल लगभग ५५,६७३ वर्ग किलोमीटर है। यह उत्तर में जम्मू-कश्मीर, पूर्व में तिब्ब...
संतरंगी दुनिया- २०
व्यंग्य

संतरंगी दुनिया- २०

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** यदि आप अपनी पत्नी को खुश रखना चाहते हैं तो अपने पर्स का मुँह खुला रखें और अपना मुँह बंद रखें। वक़्त बदल गया है, पहले लड़कियाँ सफेद घोड़े पर राजकु‌मार की कल्पना किया करती थी, आजकल बीएमडब्ल्यू में गधा भी आ जाए तो चलता है। *दुनिया में सिर्फ एक दिल ही है, जो बिना रूके काम करता है; इसलिए दिल को खुश रखो, वो आपका हो या पराया।* कोई इंसान अगर आपको केवल जरूरत पड़‌ने पर याद करता है, तो उस बात का बुरा मत मानिए, क्योंकि जब अंधेरा हो जाता है, तभी दीए की याद आती है। डाकू और नेता दोनों ही डाका डालते हैं, पर देखिए- डाकू को कारावास मिलता है और नेता को कार-आवास !! *हमारे देश में लॉजिक कोई नहीं मानता, सबको मैजिक चाहिए, इसलिए यहाँ साइंटिस्ट के बजाय बाबा फेमस है।* मैं नास्तिक हूँ, क्योंकि मैंने धर्म की आड़ में धंधे देखे हैं; ईश्वर नहीं। हमार...
चुनाव में खड़े होने का नहीं, बैठने का मज़ा है
व्यंग्य

चुनाव में खड़े होने का नहीं, बैठने का मज़ा है

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** आप कहेंगे, चुनाव तो खड़े होने के लिए होते हैं। बिल्कुल होते हैं, पर जनाब, चुनावी गणित यूँ ही नहीं जमता। यहाँ असली खेल यह नहीं कि कौन खड़ा है, बल्कि यह है कि कौन किसे बैठा सकता है। जो जितने ज़्यादा प्रत्याशियों को अपने पक्ष में “बैठा” ले, वही असली विजेता होता है। कई नेता तो जनता से वोट माँगने से पहले ही आधे प्रत्याशी खड़े कर लेते हैं,ताकि समय आने पर उन्हें अपने पक्ष में बैठा सकें। और कुछ को जानबूझकर खड़ा रहने दिया जाता है, ताकि वे विरोधी के वोट काट सकें। यह भी लोकतंत्र का एक सूक्ष्म, किंतु सशक्त गणित है। इसी गणित के स्थायी अध्यापक हैं हमारे मोहल्ले के बब्बन चाचा,चुनाव चाहे विधानसभा का हो, संसद का, पार्षद का या सरपंच का,चाचा हर बार खड़े मिलेंगे। ऐसे खड़े जैसे बगुला ध्यान लगाए किसी शिकार ...
सेवा निवृत्त और छड़ी
संस्मरण

सेवा निवृत्त और छड़ी

कमल किशोर नीमा उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** सेवा निवृत्त होने पर मन अत्यंत प्रसन्न था। सुबह से शाम तक रोज़ाना की भागदौड़ से छुटकारा मिलने की ख़ुशी के साथ यह सोचते हुए घर लौट रहा था कि आज घर मे सब लोग बहुत ख़ुश होगे किन्तु रोज़ आफिस से घर लौटने पर चाय पानी से स्वागत करने वाले आज कोई भी चाय व पानी के लिये नहीं पूछ रहा था। घर का वातावरण एकदम शांत लगने पर मेने पत्नी से पूछा सब ठीक है, उसने भी हाँ मे अपना सिर हिला दिया। ईश्वर कृपा से बच्चे शिक्षा पूरी कर अच्छे ओहदे पर नौकरी कर रहे थे। घर की समसत रुप से ज़िम्मेदारी पूरी कर भविष्य के जीवन यापन के लिये पर्याप्त धन संचय के साथ किसी प्रकार की चिंता फ़िक्र नहीं थी। समय के इस बदलाव के साथ सुबह देरी से उठना, अनियमित समय भोजन करना, टीवी के सामने दिन गुजारना व देर रात तक जागने के कारण स्वभाव मे चिड़चिड़ापन के साथ स्वास्थ्य भी कुछ ख़राब र...
भगवान परशुराम : पराक्रम, तप और सामाजिक न्याय का शाश्वत संदेश
आलेख

भगवान परशुराम : पराक्रम, तप और सामाजिक न्याय का शाश्वत संदेश

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** भारत की सांस्कृतिक चेतना विविधताओं से परिपूर्ण है, जहाँ प्रत्येक क्षेत्र अपनी विशिष्ट पहचान और आध्यात्मिक परंपराओं के लिए जाना जाता है। मध्य प्रदेश का मालवा क्षेत्र इसी परंपरा का एक जीवंत उदाहरण है। यह भूमि केवल भौगोलिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से भी अत्यंत समृद्ध रही है। इसी क्षेत्र (जानापाव) से जुड़ी भगवान परशुराम की परंपरा इसे एक विशिष्ट गौरव प्रदान करती है। भगवान परशुराम का व्यक्तित्व भारतीय चिंतन में शक्ति, तप, ज्ञान और न्याय का अद्वितीय संगम प्रस्तुत करता है। भगवान परशुराम को भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है। उनका जन्म महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के यहाँ हुआ। वे भृगु वंश के थे और विशेष बात यह है कि वे एकमात्र ऐसे अवतार हैं, जिन्होंने ऋषि कुल में जन्म लेकर भी क्षत्रिय धर्...
जाति श्रम का विभाजन नहीं, श्रमिकों का विभाजन है
आलेख

जाति श्रम का विभाजन नहीं, श्रमिकों का विभाजन है

आरुषि कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** ऐसा कोई एक निश्चित वर्ष नहीं है जब जातिगत भेदभाव "शुरू" हुआ हो। यह बहुत लंबे समय के दौरान धीरे-धीरे विकसित हुआ। यह १५००–१००० ईसा पूर्व का समय था। इसकी जड़ें अक्सर ऋग्वेद के समय (लगभग १५००–१००० ईसा पूर्व) से जोड़ी जाती हैं। 'पुरुष सूक्त' नामक एक भजन में चार वर्णों (सामाजिक श्रेणियों) का वर्णन किया गया है। हालाँकि, इस चरण में, यह व्यवस्था उतनी कठोर या जन्म-आधारित नहीं थी, जैसी कि बाद के जातिगत भेदभाव में देखने को मिली। लेकिन धीरे-धीरे, ५०० ईसा पूर्व और ३०० ईसा पूर्व के बीच, 'मनुस्मृति' जैसे ग्रंथों ने सामाजिक पदानुक्रम को औपचारिक रूप देना शुरू कर दिया। इस दौरान, जाति व्यवस्था उत्तरोत्तर वंशानुगत और प्रतिबंधात्मक होती गई। शुद्धता, अपवित्रता और सामाजिक अलगाव की धारणाएँ और अधिक प्रबल हो गईं। यहाँ इसके कुछ सबसे क्रूर पहलू दिए गए ...
सड़कछाप सड़क का दर्शनशास्त्र
व्यंग्य

सड़कछाप सड़क का दर्शनशास्त्र

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** सड़क का भी एक दर्शन होता है खासकर उस सड़क का, जो खुद सड़कछाप हो। वह सड़क जो कहीं टिककर नहीं रहती, हर मोहल्ले, हर मोड़, हर चुनावी वादे में आवारगी करती मिल जाती है। आजकल ऐसी सड़कें खूब चलन में हैं- चलन में इसलिए कि चलने लायक कम और दिखने लायक ज़्यादा होती हैं। सड़क साम्यवाद का जीवंत, धूल-धूसरित उदाहरण है। यहाँ गधे और घोड़े एक ही ताल में चलते हैं कभी-कभी तो पहचान ही गड़बड़ा जाती है कि कौन सा किस श्रेणी में है। पशु, पक्षी, मानव सबको सड़क समान भाव से अपनाती है। सड़क सबकी माँ है। अब अगर माँ की गोद में बैठकर कोई पूछे कि गधे-घोड़े का फर्क क्यों नहीं दिख रहा, तो इसमें माँ का क्या दोष! सड़क तो बस बनी है आओ, चलो, दौड़ो, गिरो, रौंदो जो लिखा लाए हो, वही होगा। आप सड़क पर हैं या सड़क पर लाए गए हैं यह नि...
हमारी संस्कृति
आलेख

हमारी संस्कृति

कमल किशोर नीमा उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** बचपन से अब तक यह हमारी संस्कृति है सुनता आ रहा हूँ किन्तु हमारी संस्कृति क्या है यह आज तक समझ नहीं पाया हूँ। हमारी संस्कृति कोई कला, विज्ञान, वस्तु अथवा क़ानून है जिसके अनुसार हमें चलना चाहिए। संस्कृति के विषय में कोई ग्रन्थ या नियमावली हो तो उसका मुझे ज्ञान नहीं। संस्कृति के विषय मे विभिन्न धर्मों के मठाधीश, स्वयंभू संस्कृति बचाओ रक्षक व हमारे देश के कर्णधार नेताओं के द्वारा समय समय पर चलाए गए आंदोलन और हमारे देश के शुभचिंतक समाचार माध्यमों से पक्ष विपक्ष में कराई जाने वाली बहस के माध्यम से ही संस्कृति बारे में जानकारी प्राप्त होती है ।मैने एक परिचित बुजुर्ग व्यक्ति जो आध्यात्मिक विषय में अधिक रूचि रखते हैं ,उनसे जिज्ञासा वश पूछा संस्कृति क्या है? यदि कोई जानकारी हो तो बताएँ। उनके मतानुसार जो हमारे ऋषि मुनियों व पूर्वजों ने अतीत ...
डॉक्टर हड़ताल पर हैं
व्यंग्य

डॉक्टर हड़ताल पर हैं

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** आज का दिन मेरी ज़िंदगी के सबसे मनहूस दिनों में बाकायदा दर्ज किए जाने लायक है। अब आप व्यंग्यप्रिय पाठक यह मत पूछ बैठिए कि क्या आज शादी की सालगिरह है। जनाब, मनहूसियत के लोकतंत्र में और भी कई अवसर होते हैं। आज डॉक्टरों की हड़ताल है। जी हाँ, धरती के भगवानों पर हो रहे अत्याचारों के विरोध में सारे भगवान बाकायदा हड़ताल पर हैं। अब आप सोचेंगे, इसमें मनहूस होने जैसा क्या है? हड़ताल का मतलब न ओपीडी की खटर-पटर, न इमरजेंसी की धमा-चौकड़ी ना ह मरीज़ों के रिश्तेदारों की। यानी एक दिन की खुली साँस। पर भाई साहब, इस बार डॉक्टर यूनियन ने हड़ताल को हड़ताल नहीं, नजरबंदी बना दिया है। फरमान हुआ है कि कोई शहर नहीं छोड़ेगा, कोई आउटिंग पर नहीं जाएगा। बस घर में बंद रहो और सामूहिक रूप से एक बार कलेक्ट्रेट जाकर ज्ञा...
एक माँ की कसक
लघुकथा

एक माँ की कसक

नील मणि मवाना रोड (मेरठ) ******************** रोहित शर्मा, एक सम्मानित व्यवसायी, ने अपनी तेइस वर्षीय बेटी आन्या का रिश्ता एक ऐसे संपन्न संयुक्त परिवार में तय कर दिया था, जो अपने फलते-फूलते व्यापार साम्राज्य के लिए मशहूर था। उनके लिए यह किसी सपने जैसा रिश्ता था- सुरक्षा, प्रतिष्ठा और मान-सम्मान, सब एक ही प्रस्ताव में समाए हुए। कॉलेज से नई-नई निकली आन्या बेहद उत्साहित थी। भव्य समारोह, महंगे तोहफ़े और बड़े परिवार में कदम रखने का ख्याल उसके लिए किसी रोमांच से कम नहीं था। उसने मासूमियत से कहा- “माँ, वहाँ तो मेरे पास हमेशा कज़िन्स रहेंगे! मुझे कभी अकेलापन नहीं लगेगा। उनका इतना बड़ा बंगला है मां… ढेर सारे नौकरानी-नौकर हैं तो काम की भी दिक्कत नहीं होगी।” उसकी आँखों में मासूम चमक थी। पर माँ, मीरा अनुभवी थी, उसके चेहरे की मुस्कान गायब थी। उसने उस परिवार के बारे में बड़े किस्से सुने थे- जह...
“कवि, कविता और वो …”- कवि शब्दशेखर ‘उन्मुक्त’
व्यंग्य

“कवि, कविता और वो …”- कवि शब्दशेखर ‘उन्मुक्त’

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** कवि के लिए कविता जैसे चौथ का चाँद, और कवि जैसे चकोर- एकटक निहारता हुआ अपनी कविता को... कविता ही उसकी ओढ़नी, बिछावन, सब कुछ। कवि महोदय की रातें और पत्नी की नींद के बीच छिड़ जाती है छंदों की जंग। बस दिख जाए कविता- विचारों के उमड़ते-घुमड़ते बादलों के बीच कहीं एक झलक मिल जाए, एक पूँछ सी ही नजर आ जाए, फिर तो खींच के निकाल लेंगे बाहर! कवि बेचारा, कविता का मारा- मारा-मारा फिरता है जंगल में। कविता जैसे बाघिन- दिखेगी तभी ‘साइटिंग’ होगी। ‘दिखेगी तनिक गम्म तो खाओ! कवि अपनी लेखनी की बंदूक ताने बस फिरता है दिखे कहीं, तो करे शिकार। पूरी कविता नहीं तो पूँछ ही मिल जाए, उसी को ले जाकर दिखा देंगे! कविता की पूँछ पकड़ना भी बहुत ही "कवियोचित", काम है, मित्र। इधर कवि से अग्निसमक्ष सात फेरे लेकर आयी वो ..यानी...
जब-जब बिखरता समाज, तब-तब याद आते हैं श्रीराम
आलेख

जब-जब बिखरता समाज, तब-तब याद आते हैं श्रीराम

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** क्या आज का समाज उस आदर्श की ओर अग्रसर है, जिसे हम ‘रामराज्य’ के नाम से जानते हैं, या हम उससे लगातार दूर होते जा रहे हैं? यह प्रश्न केवल दार्शनिक नहीं, बल्कि हमारे समय की सबसे बड़ी सामाजिक चुनौती भी है। श्री राम नवमी का पावन पर्व हमें इसी आत्ममंथन का अवसर प्रदान करता है। त्रेतायुग में श्रीराम का अवतरण केवल एक धार्मिक घटना नहीं, बल्कि मानवता को दिशा देने वाला एक युगांतरकारी क्षण था। आज, जब समाज अनेक प्रकार के नैतिक और सामाजिक संकटों से जूझ रहा है, तब श्रीराम के आदर्श पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होते हैं। भगवान विष्णु के सातवें अवतार के रूप में जन्मे श्रीराम ने अयोध्या में राजा दशरथ और माता कौशल्या के यहाँ जन्म लेकर यह सिद्ध किया कि महानता वंश या वैभव से नहीं, बल्कि चरित्र और आचरण से निर्धारित होती है। उनके ज...
जूता शास्त्र
व्यंग्य

जूता शास्त्र

सुधा गोयल बुलंद शहर (उत्तर प्रदेश) ******************** पता नहीं लोग कहां से टूटे-फटे पुराने जूते उठा लाते हैं और मंचों पर फेंकने लगते हैं। कुछ को जूते लग भी जाते हैं तो कुछ माइक स्टैंड का सहारा लेकर बच भी जाते हैं। जोश में कुछ लोग अपने नए जूते भी उछाल देते हैं। मैं भी बचपन में कई बार इमली और अमिया तोड़ने के लिए पत्थर की जगह चप्पल उछाल देती थी। पर जब भी चप्पल पेड़ की फुनगी पर अटक गई और लाख कोशिशें के बाद भी नीचे नहीं गिरी तो चप्पल उछालना छोड़ दिया क्योंकि चप्पलों का उछालना कई बार बड़ा महंगा पड़ा। लोग चप्पल जूते की जगह सड़े टमाटर और सड़े अंडे उछालते हैं जो सामने वाले को घायल कम रंगीन अधिक कर देते हैं। महंगाई का जमाना है पुराने जूते काम आ सकते हैं पर सड़े टमाटर फेंकने के अलावा और किसी काम के नहीं रहते। अब इन्हें कहां फेंका जाए यह आपकी जरूरत पर निर्भर करता है। सड़कों पर जूते चलना आम बात ...
एयर इंडिया की हवाई यात्रा
यात्रा वृतांत

एयर इंडिया की हवाई यात्रा

माधवी तारे लंदन ******************** मैं हर साल अपने बड़े बेटे के साथ कुछ समय रहने के लिए ब्रिटेन जाती हूं और इस बार आते समय मेरे ज्येष्ठ सुपुत्र ने कहा कि मां इस आपकी उम्र काफी है और एक दो दिन की यात्रा में आप थक जाओगी, सामान्य क्लास में बैठ कर आपको परेशानी होगी. मैं हम दोनों के लिये इस बार फर्स्ट कलास का टिकट निकालता हूं। जरा वहां का माहौल भी देख लो। मैं उसकी बात सुन कर घबरा सी गई क्योंकि मुझे मालूम है कि फर्स्ट क्लास का टिकट और वो भी अंतरराष्ट्रीय काफी महंगा होता है। लेकिन मेरा बेटा जिद पर अड़ गया मैंने उसे बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन वह नहीं माना। मैंने कहा बेटा रेलवे में भी फर्स्ट क्लास सेकंड क्लास रहते है ना अब क्या विशेष है... वो बोला मां देख यह भी अनुभव होना चाहिए आप मुंबई तक आपको १ दिन से ज्यादा समय लगने वाला है इसलिए ये ठीक रहेगा। आखिरकार यात्रा का दिन आ गया, समय के हिसाब स...
आश्वासन पुराण
व्यंग्य

आश्वासन पुराण

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** सभा-मण्डप में धूप के छिन्न-भिन्न कण थिरक रहे थे। मध्य आसन पर विराजित महामुनि ने दीर्घ श्वास लेकर अपनी दृष्टि उस नवदीक्षित राजकुमार पर स्थिर की, जो राजनीति के रणक्षेत्र में प्रविष्ट होने के लिए अभिमन्यु- सा उत्साह लेकर आया था। राजकुमार ने करबद्ध होकर निवेदन किया “गुरुदेव, राजनीति का मार्ग कठोर और दुर्गम कहा गया है। कृपा कर वह दिव्य अस्त्र बताइए जिसके बल पर जनमानस जीता जा सके और सिंहासन की अक्षुण प्राप्ति हो।” मुनि के अधरों पर मंद मुस्कान उदित हुई; बोले- “वत्स, राजनीति में न शस्त्र काम आता है, न शास्त्र का गहन अध्ययन। यहाँ एक ही महामंत्र है आश्वासन। यही वह अदृश्य अस्त्र है जिसके बल पर राजसिंहासन डोलता भी है और टिका भी रहता है।” मुनि का स्वर गंभीर हुआ, “लोकतंत्र की भूमि में जो सबसे हरी-भरी...
नवरात्रि का संदेश: मातृशक्ति, राष्ट्रभाव और भारतीय संस्कृति की अमर चेतना
आलेख

नवरात्रि का संदेश: मातृशक्ति, राष्ट्रभाव और भारतीय संस्कृति की अमर चेतना

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** जब विश्व की अनेक प्राचीन सभ्यताएँ समय के प्रवाह में विलीन हो गईं, तब भी भारत की संस्कृति आज उतनी ही जीवंत, जाग्रत और प्रेरणादायी बनी हुई है। इसका कारण केवल इसका प्राचीन इतिहास या विशाल भूभाग नहीं, बल्कि वह गहरी सांस्कृतिक चेतना है, जिसकी जड़ें मातृत्व, शक्ति और आध्यात्मिक मूल्यों में निहित हैं। भारतीय जीवन-दृष्टि में शक्ति का अर्थ केवल सामर्थ्य नहीं, बल्कि संरक्षण, करुणा, सृजन और संतुलन की वह शक्ति है जो समाज को दिशा देती है। यही कारण है कि भारत में शक्ति की उपासना केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक दर्शन है- और इसी दर्शन का विराट उत्सव है नवरात्रि। भारतीय संस्कृति का मूल स्वर यदि किसी एक भाव में व्यक्त किया जाए तो वह है- मातृत्व और शक्ति का सम्मान। यहाँ मातृभूमि को केवल भूमि नहीं माना गया,बल्कि ...
बाप रे बाप
व्यंग्य

बाप रे बाप

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** आज हम बात करेंगे ‘बाप’ की। भगवान ने सबको एक ही बाप दिया, लेकिन दुनिया में तो बापों की बाढ़ आई हुई है। हर कोई ‘बाप’ बनने पर तुला है, कोई ‘बेटा’ बनना नहीं चाहता। एयरपोर्ट, ट्रैफिक लाइट या रेलवे लाइन पर झगड़ते लोग अक्सर चिल्लाते मिलते हैं- “तू जानता है, मेरा बाप कौन है?” और कई बार कोई सीधा-सादा आदमी उन्हें जूतों से याद भी दिला देता है कि उनका बाप कौन है। जिसका बाप विधायक है, वो मोहल्ले में कोतवाल बनकर घूमता है। ‘बाप का आशीर्वाद’ लेकर गालियाँ बाँटता है, लोगों को डराता है। बाप बेचारा अपने बेटों की परवरिश में खुद कूट-कूटकर संस्कार भरता है और बदले में वही बेटे उसके सिर पर सवार होकर बाप के बाप बन जाते हैं। कहते है- “गुरु गुड़ रह गया, चेला चीनी हो गया”, और अब तो बेटा बाप का भी बाप बन गया है, ज...