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कविता

लिखता रहूंगा
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लिखता रहूंगा

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** जब से मैंने होश संभाला, मां-बाप ने विद्यालय में डाला, गुरुजनों और साथियों ने साथ निभाया, शब्दों को कैसे गढ़ना है- यह हुनर सिखाया। तभी से लिखता चला जा रहा हूँ, कभी अपनी उलझनें, कभी दिल के फ़साने, कभी प्रेरणा देने वालों से मुलाक़ातों के तराने। कभी प्रेम, कभी पीड़ा, कभी जीवन की टीस, तकनीक की दौड़ में भी ढूंढता रहा अपनी ही किसी चीज़। अपनों के रंग, उनके वार और प्रतिघात, भरोसेमंद हाथों से भी खाई दिल पर चोट की घात। भले ही मैं कवि या लेखक न दिखता हूँ, पर शब्दों के संग निरंतर चलता हूँ। परिवार को मुस्कान देने की कोशिश में लगा, कभी अपने ही खून से भी मिला धोखा जगा। जिसे सबसे अधिक विश्वसनीय माना, उसी से जीवन का सबसे गहरा घाव पाया, तभी तो खुद की पहचान का आईना भी कभी-कभी मुझे मेरी औका...
अतरी की वादियाँ
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अतरी की वादियाँ

नरेंद्र सिंह मोहनपुर, अतरी, गया जी (बिहार) ******************** आकर देखिए जरूर यहाँ , मोहक अत्री की वादियाँ। लें खुशबू सोंधी मिट्टी की, अवलोकन करें ये घाटियाँ।। यहीं तपोवन की पुण्यभूमि , गर्म कुंड झरना पहाड़ियाँ। प्रकृति अति सुहानी लगती है , छोटी झुरमुट लताएँ-झाड़ियाँ।। जेठियन घाटी लगे अद्भुत, यहाँ दृश्य मनोरम झाँकियाँ। आकर देखें गहलौर घाटी, दशरथ की जुनूनी कहानियाँ।। शान यहाँ किसानों की है, खेतों की टेढ़ी-मेढ़ी आरियाँ। आकर निहारें अद्भुत छटा को छोटी-बड़ी यहाँ की क्यारियाँ।। परिचय :-  नरेंद्र सिंह निवासी : मोहनपुर, अतरी, गया जी (बिहार) सम्प्रति : सेवनिवृत्त वरिष्ठ प्रबंधक (पी.एन.बी.) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स...
यौवन
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यौवन

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** दिन जवानी के आते जाते रहेंगे। मोहब्बत के गीत हम भी गाते रहेंगे। नाम लेकर खुदा तेरा हम उसे मनाते रहेंगे। अफसाने तो बहुत लिखे हैं हमने हर अफ़साने में तेरे नाम के साथ उसका नाम लिखते रहेंगे। लोग पूछेंगे जब भी दर्द की वजह हम भी सर्द हवाओं के साथ उसका नाम भी हम लिखते रहेंगे। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी...
सतरंगी दुनिया- २१
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सतरंगी दुनिया- २१

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** अपनी ज़िंदगी को खुली किताब मत बनाइए, क्योंकि लोगों को पढ़ने में नहीं, बल्कि पन्ने फाड़ने में मजा आता है। *खिचड़ी की विशेषता देखिए- अगर बर्तन में पकती है तो बीमार को ठीक कर देती है और दिमाग में पके तो इंसान को बीमार कर देती है।* अजीब है दुनिया मरने वाले को रोने वाले हजार मिल जाएंगे, मगर जो जिंदा है, उसे समझने वाला एक भी नहीं मिलता है। समय का खेल भी निराला है, भरी जेब ने दु‌निया से पहचान कराई, और खाली जेब ने इंसानों की। जो लोग हमें पसंद नहीं करते हैं, उनके बारे में अजीब बात यह है, कि वे हमारी हर चीज पर नजर रखते हैं। हमारी ज़िन्दगी भी अजीब है, होती तो है हमारी, पर जीना दूसरों के लिए पड़ता है। गर्लफ्रेंड को शराब पीते देख ब्वाय फ्रेंड ने पूछा- तुम लड़की हो के भी शराब पीती हो ? गर्लफ्रेंड ने जवाब दिया, कि क्या २-४ पैग पीने के...
मजदूर
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मजदूर

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** मजदूर है, मजबूत है, मजबूर नहीं। दिन-रात वह मेहनत करता है। चैन सुकून से वह रहता है। पसीने की कमाई वह खाता है। गीत खुशी क वह गाता हैं। मजदूर है, मजबूत है……।। माना साधन उनके पास भरपूर नहीं। औरों स वह मशहूर नहीं। कंधे पर बोझ वह ढोता है। अपनी हालत पर वह नहीं रोता हैं। मजदूर है, मजबूत है….।। परिवार का पोषण करता है। नाम मालिक का रोशन करता है। गम अपना वह छिपाता है। आँसू वह नहीं बहाता है। मजदूर है, मजबूत है, मजबूर नहीं।। परिचय :- प्रीतम कुमार साहू, गुरुजी (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करे...
सब ठीक होने की कीमत
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सब ठीक होने की कीमत

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* सब कुछ ठीक होने की उम्मीद में हम हर दर्द को सहते चले जाते हैं और समय चुपचाप हमसे सब कुछ छीनता चला जाता है। हम कहते हैं बस थोड़ा और सह लो बस हालात बदल जाएँगे बस सुबह आ ही जाएगी। पर सुबह आती है तो चेहरे बदल चुके होते हैं जिन्हें बचाने की चाह थी वे यादों में बदल चुके होते हैं। हम घाव भरने का इंतज़ार करते हैं और जीवन लहू बहाकर आगे बढ़ जाता है हम भविष्य सँवारते रहते हैं, और वर्तमान दफन होता जाता है। सब कुछ ठीक होने तक सपने थक जाते हैं रिश्ते चुप हो जाते हैं! फिर एक दिन हालात सच में सुधरते हैं पर जश्न मनाने वाला कोई नहीं बचता क्योंकि जो चाहिए था सुख के लिए वह सब संघर्ष में खत्म हो चुका होता है!! परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फरव...
मैं… कहाँ रह गया मैं…?
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मैं… कहाँ रह गया मैं…?

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** मैं... मैं था कभी.. मेरा स्वाभिमान.. मेरा दंभ मगर... अब मै कहाँ रह गया हूँ मैं...... तरंग विहीन उमंग विहीन धड़कते स्पंदनों के घेरे से बाहर नाना रूपी विलग स्वरूपी संवेदनाओं से ऊपर उठ कर स्वप्न सागर में तैरने का अहसास लिए मैं हूँ पर प्रश्न है... क्या मैं हूँ...? मिचमिचाते तारों भरे नील गगन में मटमैले से प्रकाश में चंदा विहीन तारा पूरित नभ पर शायद अमावस्या है भाव विहीन भावों के गहन समंदर में तिरोहित भाव लिए मैं हूँ पर प्रश्न है... क्या मैं हूँ...? चलाचल के समागम में हरित वसुंधरा पर ढह गई मानवीय सोच सभ्यता और संस्कृति विरासत के गुण बह गये आडंबरीय सैलाब में भौतिकता की मोह धारा में चमकता मार्तंड जगाता है विश्वास पर कैसे मानूं... फिर भी अस्तित्व है मेरा पर प्रश्न है... क्य...
पाति
कविता

पाति

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** ओ निरझर बता मैं किसे सुनाऊं तेरी पाति बंधे हुए सलील को उगते हुए रवि को या स्वार्थ भरे मानव को बता तू ही बता क्या धरा का वक्ष फट नही रहा बंधे बांधों के कारण। क्या बंधा जल कोस नहीं रहा अपने आपको तुझे बहता देख तेरी व्यथा पाती से अधिक है धरती का फटना बांधों का बंधना मिट्टी का कटना वृक्षों का कटना। केवल मानव कै लिए धरती फटती हैं सहती हैं जल विहिन हो जब वह मानव को अपने मे समाती हैं तो इसमे धरती का दोष कैसा। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों स...
चलो चले भैया हम गांवों की ओर
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चलो चले भैया हम गांवों की ओर

डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' मंडला (मध्य प्रदेश) ******************** पीपल की छैंया और अमुआ की बोर, खटमिट्ठी अमिया ले आमराई से झोर, चलो चलें भैया हम गांवों की ओर। टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडी जाए खेतों की ओर, कुहू कुहू गूंजे जहां कोयल का शोर, चलो चलें भैया हम गांवों की ओर। सुरभित सुहानी सी लगे जहां नित भोर, शीतल समीर बहती जहां चहुं ओर, चलो चले भैया हम गांवों की ओर। इठलाती बलखाती बहे नदी जिस ओर, ममता की छांव में सोंधी रोटी के कौर, चलो चले भैया हम गांवों की ओर। गूंजे गीता की वाणी गूंजे अजान चहुं ओर, मंदिर में गूंजे है घंटों का शोर, चलो चले भैया हम गांवों की ओर। प्रीति का पराग झलके जहां पोर पोर, संस्कृति के रंग जहां बिखरे चहुं ओर, चलो चले भैया हम गांवों की ओर। परिचय :- डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' निवासी : मंडला (मध्य प्रदेश) सम्प्रति : प्रदेशाध्यक्ष- अखिल भारतीय ...
सुभद्रा कुमारी चौहान
कविता

सुभद्रा कुमारी चौहान

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** वीरत्व की ज्वाला से दहकती, वाणी में था हुंकार, जन-जन में जागृत करतीं वे, स्वाधीनता का संचार। कलम बनी जब शस्त्र उनका, शब्द बने रणभेरी, रानी की गाथा गाकर, भर दी हिम्मत अनेरी। नारी शक्ति का रूप प्रखर, साहस जिनका आभूषण, अंग्रेजी सत्ता से टकराईं, लेकर स्वाभिमान का वचन। झांसी की वीरांगना का, गाया अमर गान, आज भी गूंजे भारत में, उनका ओजस्वी सम्मान। ऐसी वंदनीय कवयित्री को, शत-शत नमन हमारा, वीर रस की वह अमिट ज्योति, जग में रहे उजियारा। परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : 25 अप्रैल निवास : आबिदजान (अफ्रीका) मूल निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एमए राजनीति शास्त्र बरकतुल्लाह भोपाल विश्वविद्यालय लेखन विधा : कविता, हायकु, पिरामिड, लघु कथा लेखन : लेखन के क्षेत्र में कोविद में जीवनसाथी की प्रेरणा से लेखन क...
गुरु गोविंद सिंह जी
कविता

गुरु गोविंद सिंह जी

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** गुरु ग्रंथ गुरु की वाणी सत मार्ग पर चलाएं, दसवें गुरु गुरु गोविंदसिंह जी नमन हमारा सो सो बार। धर्म देश रक्षा के खातिर किया देह बलिदान, साहस और वीरता से किया मुगलों पर है वार, झुके नहीं वह डटे रहे अपने पथ पर आज, सिख धर्म के कट्टर त्यागी बलिदानी है आप, देश भक्ति की भावना उनके लिए सम्मान, कितने गुरु अवतरित हुए गुरु ग्रंथ का मान, गुरु की वाणी धर्म हमारा पथ पर चले महान। डरे नहीं वह झुके नहीं वह थे योद्धा महान, धर्म में रहना उद्देश्य हमारा चाहे जाए प्राण, धर्म ना बदला नहीं झुकना ऐसे वीर महान । आज उनके चरित्र पर चलना है हमें साथ, नहीं तो राष्ट्र समाज संस्कृति गर्त में जा रही आज। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन ...
नमन उन शहीदों को …
कविता

नमन उन शहीदों को …

इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" गोरखाना, नोहर (राजस्थान) ******************** भारत आजाद कराने, दीवानों की वो टोली चली थी, आजादी की किताबों से, हमने बस सुनी कहानी थी। न जाने कितने परवानों ने, सीने पर खाई गोली थी, मन में अडिग संकल्प लिए, उन्होंने ही क्रांति जगाई थी। इतिहास के पन्नों में पढ़ लेना, आजादी जिनकी दीवानी थी, आजादी की किताबों से, हमने बस सुनी कहानी थी। माँ भारती की मुक्ति को, वीरों ने हँसकर कुर्बानी दी थी, कोई कैसे कह दे हमको, केवल अहिंसा से आजादी मिली थी? हाँ यह भी पढ़ना, कितनी 'लक्ष्मी' रणचंडी बन लड़ी थीं, आजादी की किताबों से, हमने बस सुनी कहानी थी। स्वातंत्र्य-यज्ञ की वेदी पर, कितनी ही माँओं की गोद सूनी थी, न जाने कितनी बहनों ने, अपनी राखी वाली कलाई खोई थी। खदेड़ दिया फिरंगियों को, जमकर धूल चटाई थी, आजादी की किताबों से, हमने बस सुनी कहानी थी। जह...
कृत्य और बर्बादी
कविता

कृत्य और बर्बादी

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** यौवन कभी तो घटेगा, बिजली संयंत्र का बायलर कभी तो फटेगा, तब नहीं होगा मुझे किसी प्रकार का आश्चर्य, वो दिन भी होगा सामान्य दिन नहीं समझूंगा कोई विशेष तिथि पर्व, क्योंकि आग इस कदर जलाया जा रहा है, हर किसी के द्वारा घी का होम दे आग भड़काया जा रहा है, नहीं मतलब किसी को देश धर्म राग से, सब संतुष्ट है भड़कती हुई आग से, नहीं पड़ना फर्क कहां लगी है आग, हर कोई भड़का रहा अग्नि धवल आग, मतलब नहीं ये आग कब कहां किसे जलायेगा, जहां ए दौर में कैसा मंजर लाएगा, वस्तु स्थिति का सामना करने बैठा है हर कोई तैयार, ग्रस्त है मानसिक रोग से राष्ट्र यार किंचित हृदय स्पंदन नहीं हो रहा है, हर हिय एक बकवास ढो रहा है, जिए जा रहा लेकर मन में इक आस, संपूर्ण लग रहा सबको किसी का बकवास, कुकृत्य कुछ अंधों की आबा...
चिरई
आंचलिक बोली, कविता

चिरई

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) चिरई चुरगुन के चिंव-चिंव बोली अउ फुँदक-फुँदक के रेंगना हर घाते सुग्घर लागथे। प्राकृतिक सौंदर्य हर चिरई चुरगुन ले हवय। चिरई चुरगुन बिना जंगल झाड़ी अउ महल अटारी ह सुन्ना लागथे। फेर गरमी दिन म नदियाँ नरवा, तरिया, डबरी सबो ह सुखा जाथे त चिरई चुरगुन मन बूँद-बूँद पानी बर तरसत रहि जाथे। कतकोंन चिरई मन तो दाना-पानी बिना अपन परान ल तियाग देथे। ऐसना समय म चिरई चुरगुन के जीव ल बचाय बर उदिम कर सकथन अपन घर के छत छानी मा, बारी बखरी मा अउ जेन मेर रुख राई हे तेन मेर सकोरा म दाना पानी राख के चिरई चुरगुन के पियास ल बुझा स सकथन। जेकर ले लहकत घाम म उड़त परकी परेवना अउ जम्मों चिरई चुरगुन मन अपन पियास ला बुझा सके। आज कल तो सहर तो बहुत दूरिहा के बात आय गांव म घलोक आघु कस चिरई चुरगुन देखे बर नइ मिलय। दिनों दिन चिरई चु...
नोहर की बदलती आबोहवा
कविता

नोहर की बदलती आबोहवा

इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" गोरखाना, नोहर (राजस्थान) ******************** भूल गए बिहानी का वैभव, भूला वो सम्मान यहाँ, भगतसिंह के नाम पे सिसक रहा ईमान यहाँ। परशुराम चौक की गरिमा, अब धुएं में खोई है, नोहर की ये पावन माटी, आज अकेले रोई है। वो गोल गटा कुआं जहाँ, जुटती थी टोलियां कभी, आज वहां सट्टे की लत ने, छीनी सबकी खुशियां सभी। शिवाजी स्टैंड की चौखट पर, कैसा ये मंजर आया है, नोहर की गलियों के साये में, डोडों का व्यापार समाया है। न लाज रही बुजुर्गों की, न खौफ रहा अब शासन का, हर नुक्कड़ पर खेल चल रहा, नशीले उस राशन का। जहाँ गूंजते थे नारे आज़ादी और क्रांति के, वहां सौदा हो रहा है आज, समाज की शांति के। घर की दहलीज लांघ कर, अब नारी भी कदम बढ़ाती है, चंद रुपयों की खातिर वो, ज़हर घरों तक लाती है। मैली हवा में हाथ धोना, अब दस्तूर बन गया, जो शहर कभी था हीरा, वो आज नासूर...
पहचान जाहिर हो
कविता

पहचान जाहिर हो

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ********************1132 सिर्फ रोने से काम नहीं चलेगा मित्र अब दरों दीवार पर सिर पटकना होगा, तथाकथित आत्माओं, भूतों की तरह अतृप्त हो इधर-उधर भटकना होगा, जिस तरह हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और होते हैं, उसी तरह लोगों को अपनी संतुष्टि जताने उछलना कूदना मटकना होगा, बंधे नहीं हो मोटी जंजीरों में, आशावादी हो अपनी अनदेखी तकदीरों से, मगर सिर फंसाए हो अंधभक्ति में, आश्वस्त हो इसकी शक्ति में, तो तैयार हो ये सोच कि मूत्र पी गोबर गटकना होगा, तब तक स्वीकार्य नहीं हो, अंधत्व की सारी अदाएं शिरोधार्य नहीं हो, इन अदाओं के साथ पूरी तरह तैयार हो, देश को खोखला करने वाले अब अय्यार हो, तैयार किये गये हो छांट चुनकर, बर्बाद ए मस्तिष्क को भरोसा है तुम पर, स्वतंत्र रहने के लिए नियमों को झटकना होगा सिर्फ रोने से काम नहीं चलेगा मित...
आंगन
कविता

आंगन

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** हर दरख्त सूना है सूनी हर शाम बिछा दि ए राहो मे हर पलक औ पांव। तुम बहुत दूर हो तन्हाई है पास अंबर पर पसर गऐ खग वृन्दो के पांख। सूना है आगंन सूनी-सूनी बगीया सूने-सूने घर द्वारे सूना सब सन्सार। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं आप राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "हिंदी रक्षक राष्ट्रीय सम्मान २०२३" से सम्मानित हैं। घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर...
वो जगह सुहानी
कविता

वो जगह सुहानी

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** वो जगह जहां बचपन में खेलते-कूदते वो जगह जहां भेदभावपूर्ण मस्त रहते वो क्या दिन थे आपस में सँगठित रहते वो क्या हंसी खुशी थी जो अतुलनीय थी कितना अपनापन था परायापन का अहसास तक नहीं होता वो जगह गांव की थी क्या राजा क्या महाराजा क्या जनता जहां आदर प्रेम का संसार दीखता वो जगह जहां एक पोखरा था वो जगह जहाँ प्रेमबन्धन था नाचते, कूदते, खेलते पोखरा के पानी में आंनद की डुबकियाँ में खेलते बचपन के आंसू भी भरपूरन आंनद से आनंदित लगते वो जगह जहां एकजुटता में एकजुट की बातें करते दुःख-सुख की घड़ियां आती वो जगह जहां सब अकेले नहीं रहते वो जगह जहां दुखद घड़ी में सहारा बनते वो जगह जहां हर एक दूसरे का सहारा रहते परिचय :- ललित शर्मा निवासी : खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) संप्रति : वरिष्ठ पत्रकार व लेखक घोषणा पत...
बोलती आंखें
कविता

बोलती आंखें

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** बोलती आँखें कहानियाँ सुनाएँ, बिना शब्द सब कह जाती, चमकती आँखों की रौशनी में, हर भावना झिलमिलाती। गहराई वाली आँखों में, सागर सा राज छिपा होता, जो डूबे इनकी लहरों में, वो खुद से भी मिल जाता। पनीली आँखों की नमी में, दर्द भी मोती बन जाता, हर आँसू चुपके से दिल का, कोई राज बता जाता। कवियों ने इन आँखों को, चाँद-सितारों से सजाया, कभी काजल की धारा बोली, कभी इश्क़ का रंग चढ़ाया। कभी इन्हें नयन-कमल कहा, कभी प्रेम का दीपक माना, कभी विरह की अग्नि बताई, कभी स्नेह का मधुर तराना। इनकी भाषा अनोखी होती, शब्दों से परे ये बोलें, कभी हँसी के फूल खिलाएँ, कभी दुख के बादल घोलें। आँखें ही दिल का आईना, हर सच्चाई दिखलाती, जो छिप जाए लबों से, वो चुपके से कह जाती। बोलती, चमकती, गहरी, पनीली-हर रूप निराला होता, आँख...
समय नहीं है
कविता

समय नहीं है

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** बड़े परिवार चार लोगों में सिमट गए घण्टों की दूरी मिनिटों में सिमट गई फिर भी आज इंसान के पास समय नहीं है। महीनों इंतजार के बाद अपनों का चेहरा देखना नसीब होता था, आज वो चेहरे मिनटों में दिखाई दे जाता है फिर भी इंसान के पास समय नहीं है। राशन, पानी, जमीन, को पाने के लिए घंटों, धूप में कतार में खड़े रहना पड़ता था आज मोबाइल पर सब काम कुछ ही पल में होता है फिर भी इंसान रोता है समय नहीं है। कहीं भी जल्दी पहुचने की रेस में सारे नियम कानून तोड़ अपनी अलग गति बनाता है, फिर भी यही कहता है यार समय नहीं है। घंटों मोबाइल पर चैटिंग, यू ट्यूब, सीरियल चलाता है लेकिन बूढे माँ बाप से मिलने उनसे बात करने का समय नहीं है। एक दिन यही इंसान वृद्ध- असहाय अकेला हो जाता है कोई इसको देखने पूछने न...
एक नई शुरुआत करें
कविता

एक नई शुरुआत करें

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* माह में एक बार ही सही कभी कोई ऐसा दिन या एक ऐसी रात बहुत जरुरी है जो सिर्फ खुद के लिए हो खुद की खुशी के लिए हो. जिसमें कोई रोक टोक कोई हिचक न हो जो भाए उसके ही साथ खुलकर जीना जो मन करे, दिल कहे दुनिया को भूलकर सारी जिम्मेदारियां एक तरफ रखकर बस चुरा लेना कोई चरम आनंद का लम्हा वक्त की डायरी से. बस खुद के लिए अपनी मस्ती में मस्त होकर ख्वाहिशों को खुलकर जीना जरूरी है बेहद. तो इस भागदौड़ वाली समझौतों से भरी जिंदगी इसकी उलझनों से लिपटी जद्दोजहद को बिल्कुल परे धकेलकर खुद की परवाह में एक नई शुरुवात करें. अपने लिए माह में एक दिन या एक रात तृप्ति पल जरूर चुराएं नीरस जिंदगी में कुछ जगमगाहट भरने के लिए खुलकर जीने के लिए मन को छोटी छोटी बेसुमार खुशियों से भरने के लिए.....! ...
दादी का गांव
कविता

दादी का गांव

डॉ. आभा माथुर उन्नाव (कानपुर) ******************** सुबह हो गई मीठी-मीठी लाली छाई चारों ओर चीं-चीं, चूं-चूं, काँव-काँव का सारे नभ में छाया शोर आशु उठा अँगड़ाई लेकर जल्दी उसे नहाना है नाश्ता कर बस्ता लेकर जल्दी स्कूल जाना है तभी उसे आ गई याद कल दीदी की कही बात कल से गर्मी की छुट्टी है एक मास की छुट्टी है मन उड़ गया सैर करने लगा गगन में मन उड़ने "पक्षी चूँ-चूँ क्यों करते हैं? क्या यह हमसे कुछ कहते हैं?" उसने पूछा कौए भाई तुम काँव-काँव क्यों करते हो? जो कहना है स्पष्ट कहो, संकेतों में क्यों कहते हो?" कौआ बोला काँव-काँव आशु चलो दादी के गाँव गाँव में दादी रहती हैं राह तुम्हारी तकती हैं कल से गर्मी की छुट्टी है एक मास की मस्ती है आशु गया मम्मी के पास बोला "मम्मी सुन लो बात कल से गर्मी की छुट्टी है एक मास की मस्ती है दादी के घर जाना है नदी में ख़...
सत्य की पुकार
कविता

सत्य की पुकार

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** मेरे भीतर का संत मुझसे कुछ कहता है। कहता है उठो देखो नया सूरज निकला है। शास्त्र का प्रकाश फैला है, शास्त्र पढ़ो। शास्त्रों को गुनों, सुनो और समझो। शास्त्र जीवन का निर्माण करते हैं, सँवारते हैं। वे उजाले का सबको नित दान करते हैं। सत्य लेकर संघर्ष करो, तो मंज़िल पाओगे। नित सुख-आनंद के नग़मे, नित गाओगे।। सूरज की नियत गति भी तो यही सिखाती है। जगहित का भाव सतत् फैलाती है।। शास्त्र लेकर हरदम बढ़ना ही होगा। बाधाएँ राहों में उनसे लड़ना ही होगा।। काँटे ही तो फूलों का मोल बताते हैं। जो योद्धा हैं तूफ़ाँ से नित भिड़ जाते हैं।। चलना है तो चलो भले कदम थक जाते हैं। मंगलगान सुनाओ क्यों पग रुक जाते हैं।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए (इत...
मुड़ता कलम का रुख
कविता

मुड़ता कलम का रुख

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** परेशां अरमानों का रुख मोड़ दिया, कलम का वो निर्भीक दौर ही छोड़ दिया, सच की स्याही अब बोझिल लगने लगी, इसलिए झूठ का सहारा थाम लिया। झूठ लिखो तो वाह-वाह के फूल खिलें, सच लिखो तो शब्दों के कंठ ही सिलें, इतना भारी हो गया है झूठ का ताज, सच दम तोड़े, नीचे गिरते ही मिलें। हाथी अब हवा में उड़ने लगे हैं, बाज़ों के पर भी झुकने लगे हैं, थूकों से लड्डू बंधने लगे जहां, वहां सच के दीप भी बुझने लगे हैं। झांसे की चादर में लिपटी हकीकत, विज्ञापन ही बन बैठा है अब इबादत, जीवन की राहों में भ्रम का ये जाल, सपनों को सच मान खोती है चाहत। चांद को धरती पे लाने की बातें, हर आका करता है मीठी सौगातें, पर इन मीठी बातों के नीचे दबकर, सांसें भी पूछें- कहाँ हैं हकीकतें? जैसे-तैसे पटरी पर आती जो जिंदगी, ऐलानों की आंध...
छल की छाया
कविता

छल की छाया

सूर्यपाल नामदेव "चंचल" जयपुर (राजस्थान) ******************** अंतर्मन की गहराई में जो मोती प्रतीति के पलते हैं, थाह समंदर सी उद्गारों की शांत चित्त को धरते हैं। चेहरों के कुछ भ्रम जाल से मर्यादा जब कुंठित होती, पल में छल की छाया से क्षदम रावण भी सीता को हरते हैं। व्याकुल धाराएं उत्पात मचाती सागर सौम्य रसातल मिलते हैं, अक्षम्य कुटिल और छल के जो खेल विसात पर चलते हैं। छल के आडंबर में आकर धर्म कर्म भी भ्रमित होते, अपने ही अपनों में छल से चाल शकुनि सी चलते हैं। छल के क्षणभंगुर बुलबुले पल में उठते मिटते हैं, निष्कलक निष्पाप आत्मा, प्रतिबिंब निर्दोष उभरते हैं। मन मिलन में, भूल जलन से प्रेमगंध के पुष्प हैं खिलते, मन मस्तिष्क स्वासों की डोरी से रिश्ते विषम भी बंधते हैं। परिचय :- सूर्यपाल नामदेव "चंचल" शिक्षा : एम ए अर्थशास्त्र , एम बी ए ( रिटेल मैनेजमेंट) व्यव...