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कविता

क्या मिलता है मुफ्त में
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क्या मिलता है मुफ्त में

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** ये हवा ये पानी, ये धूप ये जंगल पहाड़, नहीं कह सकते इसे मुफ्त का, हर जीव हर इंसान को ये प्रकृति की देन है, इनके अनुसार रहो ताउम्र सुख चैन है, बिना पानी सींचे कलियां भी नहीं खिलती, मांगो तो भी फ्री में गालियां भी नहीं मिलती, शतरंज के प्यादे, और नेताओं के वादे, बिना लाभ के नहीं होते, महीने भर का जगा, फिर साल पांच रहते सोते, ये चावल चना दे रहे मुफ्त का कहते, मगर हमारे करों के हिस्से इसमें छुपे रहते, शिक्षक बिना पैसे नहीं पढ़ाता, बिना पैसे आंतरिक व्यवस्था नहीं चल पाता, बिना वेतन मजदूर मजदूरी को नहीं जाता, बिना वेतन न्यायाधीश न्याय नहीं दे पाता, हर कर्म के पीछे स्वार्थ छुपा होता है, मजलूमों में भूख, गरीबी, दर्द छुपा होता है, सिर्फ बद्दुआ निःस्वार्थ लोग करते हैं प्रयुक्त, एक यही तो है ज...
आदत
कविता

आदत

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** मुझ तुम संग रहने की आदत है। मुझ तुमसे बाते करने की आदत है। मुझ तुम संग सब कहने की आदत है। मुझ तुम संग जीने की आदत है। मुझ तुम संग हर लम्हा बीताने की आदत है। मुझ तुम संग मस्ती में खोने की आदत है। मुझ तुम संग मुस्कुराने की आदत है। मुझ तुम संग हर खामोसी कहने की आदत है। मुझ तुम संग हर गम भुलाने की आदत है। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्र...
परीक्षा
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परीक्षा

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** तन गई प्रत्यंचा, खींचा गया डोर, दागे जा रहे अक्षर-तीर चहुं ओर, लड़ रहे नन्हे योद्धा अदम्य साहस के साथ, अनजान अभी भी नैतिक-अनैतिक के व्यूह-पथ, अक्षरों के ये शर चीरते मन-मस्तिष्क की दीवार, फिर भी सजग हैं बच्चे, करने प्रत्युत्तर प्रहार, एकाग्रता का कवच ओढ़े, संकल्पों की ढाल लिए, क्षणिक विचलन भी यहाँ अंधकार के द्वार दिए, जीतना यह रण अनिवार्य, त्यागने होंगे संशय-संघार, हर बहाना, हर बाधा को रखना होगा दूर अपार, दुश्मन के वही पुराने दाँव, पर अब सुसज्जित है नई पीढ़ी, ज्ञान-शस्त्रों से सुसज्जित, लिख रही अपनी तकदीर नई, यह जंग लौटे हर वर्ष, प्रश्नों के जंजाल लिए, उत्तर बन कर काटना है हर संशय के जाल लिए, महायुद्ध अब भी जारी है, विजय-किला दृष्टि में साकार, पताका फहराने को साध रहे है...
खिड़की पर ठहरी धूप
कविता

खिड़की पर ठहरी धूप

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** नित ही, खिड़की पर ठहरी धूप बात करती है। खिड़की पर ठहरी धूप से सौगात झरती है।। खिड़की पर ठहरी धूप मुहब्बत को समेटे है। खिड़की पर ठहरी धूप भावनाओं को लपेटे है।। खिड़की पर ठहरी धूप हर पीर को हरती है। खिड़की पर ठहरी धूप से सौगात झरती है।। खिड़की पर ठहरी धूप अहसासों का दर्पण है। खिड़की पर ठहरी धूप में प्रीति का समर्पण है।। खिड़की पर ठहरी धूप विश्वासों को धरती है। खिड़की पर ठहरी धूप से सौगात झरती है।। खिड़की पर ठहरी धूप में तो प्रखर मुस्कान है। खिड़की पर ठहरी धूप में तो प्रबल अरमान है।। खिड़की पर ठहरी धूप अंतस में इस भरती है। खिड़की पर ठहरी धूप से सौगात झरती है।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए (इतिहास) (मेरिट होल्डर), एल.एल.बी, पी-एच.डी. (इ...
विरह की व्यथा
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विरह की व्यथा

भारमल गर्ग "विलक्षण" जालोर (राजस्थान) ******************** प्राण-पखेरू उड़ गया डाली से, छूट गया संग, रह गई काली से। चाँदनी रातें अब सूली बनीं, तारों भरी छत पलकों पर ढली। हवा के झोंके सिसकियाँ लिए, दीवारों से टकराकर रुली। बिना बादल बरसा करती आँखें, नींद रूठी पलकों पर ठहरी। तकिया सूनापन लिए खड़ा है, सपनों के टुकड़े बिखरे पड़े हैं। सावन की फुहारें याद दिलाएँ, उस रात की बातें जो बीती। घनघोर घटा गरजे मन भीतर, बिजली सी चमकी आँखों में पीड़ा। पुरवैया के पैरों में लिपटी, कागज की नाव संदेशा ले चली। पर लौटकर वह खाली हाथ आई, मिला न पता उस पथिक का कहीं। दीपक की लौ सी काँपता मन, हर छाया में वह मूरत दिखती। पुकारूँ तो प्रतिध्वनि हँस देती, दौड़ूँ तो राह रोती-सी खड़ी। हे विधाता! लौटा दे मेरा साजन, नभ के तारे गवाही देंगे। विरह की अँधियारी टूटेगी जब, प...
लक्ष्मी सी मेरी पहचान
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लक्ष्मी सी मेरी पहचान

शशि चन्दन "निर्झर" इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** लक्ष्मी सी मेरी पहचान। देता देव और इंसान।। भ्रमित कर स्वयं को हर लेता इक दिन प्राण।। मेरी ही कोख से निकल.... पलता वो वक्ष स्थल से.... खोट भर नैनों में फिर... दामन भरता अश्रुजल से।। कभी अग्नि में स्वाह तो कभी पत्थर होना पड़ा।। कभी टुकड़े हुए हज़ार, तो कभी बेघर होना पड़ा।। क्रोध करूं या हास्य करूं। या स्वयं का परिहास करूं।। निर्णय तो करना होगा.... मौन रहूं या विनाश करूं।। सोचती हूं उठा लूं कोरा कागज़, दिखा दूं अपनी कलम की ताकत। ताकि जन्में, जब-जब "कविता".. "दिनकर" आकर छंदों से करें स्वागत।। परिचय :- इंदौर (मध्य प्रदेश) की निवासी अपने शब्दों की निर्झर बरखा करने वाली शशि चन्दन एक ग्रहणी का दायित्व निभाते हुए अपने अनछुए अनसुलझे एहसासों को अपनी लेखनी के माध्यम से स्याह रंग कोरे कागज़ पर उतारतीं हैं,...
मरिचिका
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मरिचिका

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** तपती दुपहरी की सङको पर ङगमगाते पैरो की थाप पर मृग मरिचिका भागती जा रही दूर बहृत दूर, दूर जैसे जिन्दगी से दूर भागता है कोई ऐसे समय हवाओ का बवन्ङर साथ नही देता सिर्फ देखता है अपनी उचाई, अपनी गोलाई रेत के ढेर मे क्षीण काया भटकती है मरिचिका के पीछे जल को खोजती है। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं आप राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "हिंदी रक्षक राष्ट्रीय...
समय का बदलाव
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समय का बदलाव

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** सब कुछ बदल जाता है वक़्त के साथ प्रतिष्ठा, परंपरा, मर्यादा मगर नहीं बदलता व्यक्ति का व्यक्तित्व। सब कुछ चला जाता है वक़्त के साथ अपने, पराये, हमराही मगर नहीं जाता व्यक्ति का अपनेपन का वहम। सब कुछ खो जाता है समय के साथ बचपन, यौवन, पद मगर नहीं खोता अपनों के लिए दिया वक़्त। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिं...
पर्वत जैसा अडिग रहो
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पर्वत जैसा अडिग रहो

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** अडिग रहो तुम, भीड़ की दिशा नहीं विचारों की दिशा चुनो, जहाँ सच कठिन हो, वहीं अपने कदमों का संकल्प बुनो, क्यों भटकते हो नारों में, जब मार्ग तुम्हारे पास लिखा है, भारतीय संविधान की रोशनी में हर उत्तर सुस्पष्ट दिखा है, याद करो वो कर्मपथ, जहाँ शब्द नहीं, संघर्ष बोलता था, भीमराव अंबेडकर का हर एक विचार अन्याय के विरुद्ध डोलता था, और चेतना की मशाल लिए चल पड़ा एक और पथिक महान, कांशीराम ने सिखाया जागृत समाज ही होता है सच्चा बलवान, समता का स्वर केवल कहने से नहीं, जीवन में उतारना पड़ता है, समानता का दीप जलाने को अहंकार खुद ही हारना पड़ता है, बंधुत्व की बात अगर करते हो, तो भेदभाव से रिश्ता तोड़ो, अपने भीतर के छोटेपन को पहचानो, समझो और छोड़ो, युवा हो तुम केवल उम्र से नहीं, विचारों की ...
ऋतुराज बंसत
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ऋतुराज बंसत

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** बसंत आज तू भी है, खिला-खिला सा , निर्मल जल नदियों में बहता, शुद्ध हवा पवन है बहता, खेतों में पीले है फूल, ऋतु को आगाज है करता, ऋतुओ का राजा है बसंत, हरियाली अंगड़ाई लेती, कोयल पपीहा करे है शोर, मन चंचल मदमस्त है रहता, चहूं दिशा हरियाली ओढ़, वन में देखो मोर हे नाचे, बसंत भी देखो इतराए, आमो पर छाया हे मोड, बने हे देखो कान्हा के सिर का मोड, बसंती फूल, बसंती साडू, बसंती राग, बसंती जामा, बसंती रंग से खेले हे कान्हा, बरसाने में देखो फाग, किरण कोर जडी़ है साड़ी, पीले फूल और हरियाली, ओड़े देखो धरती आज, भारत माँ की यही पहचान।। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर्स व्यवसाय : बिजनेस वूमेन विशिष्ट उपलब्धियां :...
जिंदगी की सीख
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जिंदगी की सीख

चेतना सिंह प्रकाश "चितेरी" प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) ******************** जिंदगी रुला रही है-रो लें, जिंदगी हँसा रही है-हँस लें। जिंदगी अभिनय करा रही है- मुस्कुरा निभा लें, जिंदगी एक सफर है- अनंत की ओर बढ़ चलें। जिंदगी मुसाफिर है इस संसार में, आना-जाना इसका नियम पुराना है। रुक न पाया कोई यहाँ कभी, यादों का ही बस खजाना है। यहीं मोह का बंधन है, गहरे रिश्तें भी टूट जाना है । अपनों का बिछड़ना- यहीं रोना है। सबको एक दिन छोड़ जाना है, चाहे जितना चाहें भी कुछ न भूल पाना है। परिचय :- चेतना सिंह प्रकाश "चितेरी" निवासी : प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपन...
जाने की जल्दी
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जाने की जल्दी

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** फर्राटे भरती कार, बाइक, ट्रक, हर ओर बिखरी है आपाधापी, होड़ है आगे निकल जाने की, आगे वालों को भी पछाड़ आने की। जिंदगी बन गई है महज़ रफ्तार, चाहे शांत कछुआ हो, या फुर्तीला चीता, या चालाक सियार। संभलो- ज़रा ठहरो, एक पल ब्रेक लगाओ, सुरक्षित आओ, सुरक्षित जाओ। क्या पता यह जाने की जल्दी तुम्हें कहीं दूर ले जाए, इतना दूर- जहाँ से लौटने की कोई राह न आए। यह दौड़ किसे दिखानी है? किसे हराने की ठानी है? हिरण-सी दौड़ में कौन-सी कस्तूरी पाना है? और इस अकड़े हुए अहंकार से आख़िर किसे झुकाना है? कहते हो- जिंदगी कम पड़ जाती है जीने को, फिर क्यों अनदेखा करते हो इन धड़कनों, इन जख्मों को सीने में सीने को? भाई, जीवित रहोगे- तो हर मंज़िल पा जाओगे, पर अगर रफ्तार को ही चुन लिया, तो रास्ते ही तुम्ह...
यादें
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यादें

काजल कुमारी आसनसोल (पश्चिम बंगाल) ********************110 कभी-कभी कुछ रिश्ते बहुत खूबसूरती से शुरू होते हैं, पर वक़्त के साथ वही रिश्ते सबसे ज़्यादा रुला जाते हैं। शुरुआत में हर बात अपनी लगती है, फिर अचानक हालात ऐसे बनते हैं कि दूरी मजबूरी बन जाती है। ना कोई ग़लती साफ़ दिखाई देती है, ना ही कोई पूरी तरह बेगुनाह होता है। कभी कोई बदल जाता है, तो कभी हालात इंसान को बदल देते हैं। वो वादे, वो कसमें सब अधूरी रह जाती हैं, और हम चाहकर भी उन्हें पूरा नहीं कर पाते। धीरे-धीरे अजनबी बन जाते हैं, जिन्हें कभी अपनी जान से ज़्यादा चाहा था। सबसे दर्दनाक बात ये होती है कि ना वो पास होते हैं, ना हम उनसे दूर हो पाते हैं। बस यादों में जीते रहते हैं, और सोचते हैं। अगर मिलना ही नहीं था, तो किस्मत ने मिलाया ही क्यों ... परिचय :- काजल कुमारी निवासी : ...
माता के नवरूप
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माता के नवरूप

उषाकिरण निर्मलकर करेली, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** प्रथम दिवस नवरात्र का, सजा मातु दरबार। शैलसुता माता सदा, करती है उपकार।।१।। दूजे दिन आराधना, ब्रम्हचारिणी रूप। संयम तप वैराग्य की, देवी छटा अनूप।।२।। माँ के मस्तक पर सजा, चंद्र घंट आकार। मात चंद्र घंटा करे, असुरों का संहार।।३।। आलोकित ब्रह्मांड है, जिनके तेज प्रताप। माँ कुष्मांडा जाप से, मिटे शोक सब पाप।। ४।। स्कन्दमात सुमिरन करो, पंचम दिन नवरात। शुभ्र वर्ण पद्मासना, शुभता की सौगात।।५।। षष्टम माँ कात्यायनी, सिंह पर है आरूढ़। माँ महिषासुर मर्दिनी, महिमा जिनकी गूढ़।।६।। कालरात्रि माता भजो, शुभंकरी शुभ नाम। रक्तबीज आतंक को, जिनसे मिला विराम।।७।। महाशक्ति फलदायिनी, करे सदा कल्याण। अष्टम दिन गौरी भजो, माँ भक्तों की त्राण।।८।। मात सिद्धिदात्री तुम्हें, बारम्बार प्रणाम। नवम रूप में मातु को, पूज...
नीम का पेड़
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नीम का पेड़

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** हर साल की तरह नवोदित हुई एक नई सुबह ले आई जीवन का एक नव वर्ष नव चिंतन, नव मनन ले नव आशाओं का दीप.... जलते ही आस-दीप मानो सिमट गये हों जीवन के अंधेरे मगर ये प्रकाश उघाड़ गया जीवन के प्रत्यक्ष-परोक्ष तन, मन पर लगे आघाती घावों को एक पल खुशी हुई अतीत के सुनहरे पल देख तो कभी व्यथित हुआ मन छद्म हंसी के दुशाले के आवरण में छिपे रेशा-रेशा, रिसते दर्दीले घावों को.... मगर मन ने आज जाना सच्चा साथी है कौन..? वो है मेरा हम उम्र दालान में खड़ा नीम का पेड़ जिसने पिया है छिप-छिप मेरे तिक्त आँसूओ का जल और.. बदलते कैलेंडर में भी मुस्कुराता रहा है और.. होने दिया खारा अपने ही अस्तित्व को मुस्कान स्वरूप रहा हरा-भरा... साक्षी था मेरे हर गुण-दोष रक्त के ढक लेता था सब अपने हरे पत्तों के जाल ...
सफेद पोश
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सफेद पोश

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** आज समाज के सभागारों में खामोशी का साम्राज्य क्यों है, सफेदपोश चेहरों पर सन्नाटा, अंतरमन में आज भी राज क्यों है। जब अन्याय की आंधी चलती है, दीपक भी कांपने लगते हैं, पर विचारों के सूर्य होकर भी, ये लोग मौन में ढलने लगते हैं। भीष्म, पांडव, विदुर की तरह सब दृश्य निहारते रह जाते हैं, सत्य सामने रोता रहता, ये कर्तव्य से नज़र चुराते हैं। कलम जिनकी तलवार थी, आज म्यान में सोई क्यों है, विवेक की आवाज़ होते हुए भी, अंतरात्मा खोई क्यों है। सम्मानित मस्तिष्कों का मौन, समाज को पीड़ा देता है, जब प्रहरी ही सो जाए तो, अन्याय खुलकर जीता है। उठो, तुम्हारी वाणी में ही परिवर्तन का सार छिपा है, मौन तो केवल बंधन है, सत्य बोलना ही असली तप है। परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : 25 अप्रैल निवास : आबिदजान (अफ्रीका) मू...
जीवन की लीला
कविता

जीवन की लीला

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** जीवन का खेल है खूब निराला अमृत म घुलता विष का प्याला कहीं अमृत का लाजबाव स्वाद निस्वार्थी का वही महाप्रसाद ।।१।। सांस जबतक, आस तबतक ईश्वर की भक्ति है जप और तप ।।२।। स्वार्थ का भरता जीवन संसार भ्रमित क्यों करो त्वरित दरकिनार जीवन जब अविराम चलती गाड़ी असीम आंनद, सच्ची होती खाड़ी ।।३।। राह पाने में बने जो स्वर्थी खिलाड़ी भ्रमित भाषा में कहे, है वो अनाड़ी।।४।। राह को मतलबी जीवन क्यों बनाते जीवन में स्वयं रोढ़ा, दिख आते दुख वेदनाओं का ज्ञान समझ पाते जीवनसंसार की लीला समझ जाते ।।५।। कामक्रोध लोभमोह की मौजमस्ती जीवन में बन जाती है हरदम सस्ती उदारता त्याग सेवाभाव करुणाप्यार यहीजीवनसाथी, यही सच्चा संसार।।६।। परिचय :- ललित शर्मा निवासी : खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) संप्रति : वरिष्ठ पत्रकार व लेखक घोषणा पत्...
ये दौर और है
कविता

ये दौर और है

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** जीना है चैन से तो मिलजुलकर रहो, गर पता हो राज की कोई बात तो इशारों में भी न बताओ मुंह सिलकर रहो, एकलव्यों मुगालते में न रहना हर शाख पर चिपके हुए हैं द्रोणाचार्य, बिना बताए कब काट ले अंगूठा जो मुस्तकदिल के लिए न हो स्वीकार्य, मुट्ठी भर मस्तिष्क रहते हैं सदा सक्रिय, सूर्य की दिशा मोड़ सकते हैं कभी भी जब आ जाए अपने लिए स्थिति अप्रिय, अब सोचो जरा क्या व कैसा हो कदम, मिले कामयाबी और टूटे न मन का भरम, झूठों और शोषेबाजों का है अब तो दौर, साथ न दो तो शायद बचे न कोई ठौर, गिरवी रहने दो अपना मन मस्तिष्क, विरोध से मिट न जाए बचा खुचा भविष्य, तो मिलाओ उनके हां में हां, बचा रह जाए शायद अपना और अपनों की जां, झूठ खूबसूरत और यकीं लायक है ये वक्त काबिले गौर है, ये दौर और है, ये दौर और है। ...
नैनिका
कविता

नैनिका

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** प्यारी इस मुस्कान पर, सब जाते बलिहार। अधरों पर उँगली रखी, बहती है रसधार।। बहती है रसधार, माथ ज़ुल्फें घुँघराली। मिश्री जैसे बोल, बड़ी है भोली- भाली।। लाल-लाल हैं गाल, देख आँखें कजरारी। करते सभी दुलार, नैनिका लगती प्यारी।। जाती शाला नैनिका, बरसे सावन झूम। बारिश से बचके चली, माँ का माता चूम।। माँ का माथा चूम, लगाती बचने छाता। होती गीली फ्राक, मगर सावन है भाता।। हर पग रखे सँभाल, बूँद रिमझिम है गाती। हर्षित होकर आज, नैनिका शाला जाती।। पानी में सँग खेलती, निशदिन करे दुलार। मछली भाती नैनिका, करती उसको प्यार।। करती उसको प्यार, खिलाती उसको दाना। निहिरा रहती साथ, मधुर फिर गाती गाना।। रंग-बिरंगी मीन, कहें सब जल की रानी। देती है संदेश, सुनो जीवन है पानी।। परिचय :- मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी...
भारत माता
कविता

भारत माता

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** गाती रहेगी युगों-युगों तक गीत तेरे मां धरा फूलों की घाटी से होगी पुष्पों की बरखा मां कन्या कुमारी के सागर की लहरें करेगी पद प्रक्षालन प्रस्तर-प्रस्तर गान गाएंगे जन-गण-मन। वीर सैनिक करेंगे केशरिया फूलों से स्वागत साधनारत साधक सुनाएंगे ॐ शान्ती का मन्त्र हरियाली की पगड़ी बांधे कृषक करेंगे जय-जय कार यही भारत के तिरंगे की शान। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं ...
वो कम ख़ुदा न थी
कविता

वो कम ख़ुदा न थी

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* चार जने बैठे थे जीमने रात का भोजन सब बच-बच कर खा रहे तीनों बच्चे तक समझदार पीते बीच-बीच में पानी पिता लेते नक़ली डकार. पर कम ख़ुदा न थी परोसने वाली बहुत है खुदा अभी इसमें मैंने तो देर से खाया कहते परोसती जाती. माँ थी सबके बाद खाने वाली जिसके लिए दाल नहीं देवकी में बची थी हलचल चुल्लू भर पानी की और कटोरदान में भाप के चंद्रमा जैसी रोटी की छाया थी। परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फरवरी निवासी : पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "समाजसेवी अंतर्राष्ट्रीय सम्मान २०२४" से सम्मानित घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स...
एक युग, एक विचार
कविता

एक युग, एक विचार

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** ग्वालियर, मध्यप्रदेश की पावन धरा ने जन्म दिया एक बालक को, नाम हुआ अटल, स्वरों में कविता, शब्दों में सत्य, वाणी थी सरल, मन प्रखर, अडिग, स्थिर, निर्मल। पिता शिक्षक संस्कारों की छाया, माँ की ममता, राष्ट्र का स्वप्न, बाल्यकाल से ही चेतना जागी, भारत बने विश्व में उज्ज्वल स्वर्ण-रत्न। कलम उठी तो कविता बह चली, राजनीति आई तो सेवा बन गई, विचारों में मतभेद रहे होंगे, पर मर्यादा कभी न टूटी, न झुकी, न गई। जनसंघ से संसद तक की यात्रा, संघर्षों से रचा हुआ इतिहास, एक नहीं, कई बार पराजय मिली, पर हर हार बनी भविष्य का प्रकाश। “हार नहीं मानूँगा” कहने वाला, स्वयं उस पंक्ति का प्रमाण था, लोकतंत्र का सच्चा प्रहरी वह, विपक्ष में भी जिसकी वाणी समाधान था। तीन-तीन बार बने प्रधानमंत्री, पर सत्ता कभी स...
साहस
कविता

साहस

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** साहस रखिए उर सदा, श्रम को करिए नित्य। लक्ष्य मिलेगा फिर मनुज, चमको बन आदित्य।। चमको बन आदित्य, सत्य की पकडो डोरी। दृढ़ निश्चय हो साथ, काम से मत कर चोरी।। आलस को तू छोड़, बनोगे मानव पारस। अपने मन को जीत, सदा उर रखिए साहस।। बाधा सारी तोड़ कर, साहस से लो काम। कर्मवीर आगे बढ़ो, होगा जग में नाम।। होगा जग में नाम, तिलक लगता है माथा। रिपु का करना नाश, विजय की फिर है गाथा।। स्वयं गढ़ोगे भाग्य, भजो नित कृष्णा राधा। रखो सदा विश्वास, तोड़ कर सारी बाधा।। गाथा गाओ शोर्य की, गढ़ कर नूतन पाथ। साहस से नित काम लो, धैर्य सदा हो साथ।। धैर्य सदा हो साथ, गान आल्हा हो न्यारा। जिसमें हो उत्साह, जीत लेता जग सारा।। सत्पथ की हो चाह, विजय टीका है माथा। मन हो उर्जावान, शौर्य की गाओ गाथा।। परिचय :- मीना भट्ट "सिद्धा...
मन के वैचारिक भूत
कविता

मन के वैचारिक भूत

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** रक्तरंजित माटी ले लहू का लाल रंग पल-पल करती आक्रोशित इंसानी मन चंचलता वश डोलता मन कभी करुण तो कभी क्रोधित अलग समय पर मन के भाव अलग मन बदले पल-पल ... हर बदलते पल राहें बदलती सोच की सब निर्धारित करता है अपना स्वयं का मन जब सोचता है सवार रहते हैं मन पर भांति-भांति के वैचारिक भूत चंद भूत बाहर निकल आते हैं अतीत के दड़बे से कुछ भूत घूमते रहते हैं इंसान के वर्तमान से और... चंद काल्पनिक भूत टपक जाते हैं भविष्य के ऐसे में उलझा रहता है इंसान इन्हीं भूतों के गठबंधन में फंसता जाता है पल-पल ... इंसानी कलेजे में भँवर सा घूमता है उफनती लहरों से रचता रहता है भूतों का अंतर्द्वन्द्व अपना कपोल-कल्पित संसार लोटपोट हो रहता अपने ही भावों के बवंडर में छटपटाता रहता है अद्भुत मगर भयंकर काल्पनिक...
बसंत के दिन
कविता

बसंत के दिन

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** तुम्हें देती हूँ बसंत के दो दिन क्या अपने हाथों की लकीरों से थोड़ी सी दूब मुझे दोगे, जिसको रख शिव के चरणों में मांग लूंगी तुम्हारे सुने पलों की रौनक !! प्रकृति का जो स्नेह बरसा है तुम पर वो स्नेह वो करुणा मुझे प्यारी है, ये धरा ये गगन ये जीव इन सभी में तुम्हें पाती हूँ, क्या इन बिखरे इंद्रधनुषी रंगों में मुझे समेट पाओगे ! क्या ले चलोगे एकबार नदी के तट पर मुझे मांग लूँगी उसकी कोमलता- निर्मलता, तुम्हारे उम्र भर के लिए , अच्छा लगता है रोज मुझे चांद को निहारना क्या थोड़ी देर मेरे पास बैठ पाओगे!! जीवन जीने का नाम है मगर जो कभी धड़कने टूटी मेरी, क्या ढलते सूरज के बसंती रंगों से मुझे सजा पाओगे !! ज्यादा कुछ नहीं मांगती इस पल-पल बदलते दौर मे, क्या आपने अंतर्मन में मुझे थोड़ी सी...