कभी छोटी थी मैं
श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी
लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
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जब छोटी सी हुआ करती थी मैं
बहुत ज्यादा बाते किया करती थी
पूरा घर सर पर उठाए रहती थी
थोड़ा बड़ी हुई,
सबने कहा थोड़ा कम बोला करो
नासमझ थी समझ नहीं पाती थी
कि, पहले तो मेरे बोलते रहने से
सभी खुश हुआ करते थे
अभी कह्ते है, कम बोला करो
थोड़ा और बड़ी हुई,
घर बदला लोग बदले
बोलना अपने आप कम हो गया
फिर भी डांट मिली
मैं और भी चुप हो गई
ना बोलने को लोगों ने बेवकूफ
और मंद बुद्धि की उपमा मिली
कभी कुछ बोलना चाहा तो
जवाब मिला तुम जानती ही क्या हो
तुम चुप रहो, बच्चे आए, बड़े हुए
मैंने फिर बोलना शुरू किया
किन्तु फिर से चुप करा दिया गया
तुम चुप रहो, बुढ़ी हो गई हो
कुछ याद नहीं रहता तुमको
अब तुम आराम करो !
चुप रहते रहते आत्मा में कहीं
सब कुछ दबा दबा सा रह गया है
अब तो जाने का वक्त आ रहा है
कुछ बोलूँ इसक...



















