खिड़की पर ठहरी धूप
प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे
मंडला, (मध्य प्रदेश)
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नित ही, खिड़की पर ठहरी धूप बात करती है।
खिड़की पर ठहरी धूप से सौगात झरती है।।
खिड़की पर ठहरी धूप मुहब्बत को समेटे है।
खिड़की पर ठहरी धूप भावनाओं को लपेटे है।।
खिड़की पर ठहरी धूप हर पीर को हरती है।
खिड़की पर ठहरी धूप से सौगात झरती है।।
खिड़की पर ठहरी धूप अहसासों का दर्पण है।
खिड़की पर ठहरी धूप में प्रीति का समर्पण है।।
खिड़की पर ठहरी धूप विश्वासों को धरती है।
खिड़की पर ठहरी धूप से सौगात झरती है।।
खिड़की पर ठहरी धूप में तो प्रखर मुस्कान है।
खिड़की पर ठहरी धूप में तो प्रबल अरमान है।।
खिड़की पर ठहरी धूप अंतस में इस भरती है।
खिड़की पर ठहरी धूप से सौगात झरती है।।
परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे
जन्म : २५-०९-१९६१
निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश)
शिक्षा : एम.ए (इतिहास) (मेरिट होल्डर), एल.एल.बी, पी-एच.डी. (इ...


















