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पद्य

खिड़की पर ठहरी धूप
कविता

खिड़की पर ठहरी धूप

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** नित ही, खिड़की पर ठहरी धूप बात करती है। खिड़की पर ठहरी धूप से सौगात झरती है।। खिड़की पर ठहरी धूप मुहब्बत को समेटे है। खिड़की पर ठहरी धूप भावनाओं को लपेटे है।। खिड़की पर ठहरी धूप हर पीर को हरती है। खिड़की पर ठहरी धूप से सौगात झरती है।। खिड़की पर ठहरी धूप अहसासों का दर्पण है। खिड़की पर ठहरी धूप में प्रीति का समर्पण है।। खिड़की पर ठहरी धूप विश्वासों को धरती है। खिड़की पर ठहरी धूप से सौगात झरती है।। खिड़की पर ठहरी धूप में तो प्रखर मुस्कान है। खिड़की पर ठहरी धूप में तो प्रबल अरमान है।। खिड़की पर ठहरी धूप अंतस में इस भरती है। खिड़की पर ठहरी धूप से सौगात झरती है।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए (इतिहास) (मेरिट होल्डर), एल.एल.बी, पी-एच.डी. (इ...
राम जन्मे कौशल्या के
भजन

राम जन्मे कौशल्या के

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** राम जन्मे कौशल्या के कैकई के भरत लाल सुमित्रा ने जाए लखन शत्रुघ्न जन्मे देखो अयोध्या धाम। राजा दशरथ प्रसन्न है दान करें धन धन्य, हीरा-मोती-माणक-पन्ना लूटा रहे दे थाल। नगरवासी थाल सजाये करें आरती दीप जलाएं, मन हरषे कौशल्या, केकई सुमित्रा ने भी देखो दो- दो लाल है जाये, दशरथ आंगन बटे बधाई सखिया देखो मंगल गान है गाये लाला के जनम की देखो बधाई गाये देखो बधाई गाये। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर्स व्यवसाय : बिजनेस वूमेन विशिष्ट उपलब्धियां : १. अंतर्राष्ट्रीय साहित्य मित्र मंडल जबलपुर से सम्मानित २. अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना उज्जैन से सम्मानित ३. राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "साहित्य शिरोमणि अंतर्र...
विरह की व्यथा
कविता

विरह की व्यथा

भारमल गर्ग "विलक्षण" जालोर (राजस्थान) ******************** प्राण-पखेरू उड़ गया डाली से, छूट गया संग, रह गई काली से। चाँदनी रातें अब सूली बनीं, तारों भरी छत पलकों पर ढली। हवा के झोंके सिसकियाँ लिए, दीवारों से टकराकर रुली। बिना बादल बरसा करती आँखें, नींद रूठी पलकों पर ठहरी। तकिया सूनापन लिए खड़ा है, सपनों के टुकड़े बिखरे पड़े हैं। सावन की फुहारें याद दिलाएँ, उस रात की बातें जो बीती। घनघोर घटा गरजे मन भीतर, बिजली सी चमकी आँखों में पीड़ा। पुरवैया के पैरों में लिपटी, कागज की नाव संदेशा ले चली। पर लौटकर वह खाली हाथ आई, मिला न पता उस पथिक का कहीं। दीपक की लौ सी काँपता मन, हर छाया में वह मूरत दिखती। पुकारूँ तो प्रतिध्वनि हँस देती, दौड़ूँ तो राह रोती-सी खड़ी। हे विधाता! लौटा दे मेरा साजन, नभ के तारे गवाही देंगे। विरह की अँधियारी टूटेगी जब, प...
अंतिम तुमको मेरी पुकार
गीत

अंतिम तुमको मेरी पुकार

राम राज सिंह उन्नाव (उत्तर प्रदेश) ******************** प्रणय-गीत अंतिम तुमको मेरी पुकार।। नवल विटप जो पीट हो रहा उसके तुम हो प्राण। नयन मेघ से आज करा दो अमिय प्रेम रस पान। प्रकृति सजाती निज आँगन में नित नूतन उद्यान। मेरे मन मधुवन में गुंजित किन्तु विरह का गान। आज विदाई की बेला है, द्वार खड़े है मेरे कहार।। अंतिम तुमको मेरी पुकार।।१।। प्रतिदिन पथ में पुष्प बिछाता साथ मधुर मुस्कान। औचक ही मै खिल जाता हूँ तुम्हे निकट ही जान। किन्तु मिलन वह एकाकी बस क्षण भर का अवधान। फिर उसी वेदना के क्रंदन का होता नित्य वितान। सुखद प्रणय की अभिलाषा में, जीवन रण न मै जाऊ हार। अंतिम तुमको मेरी पुकार ।।२।। मन में है छवि बसी तुम्हारी और तुम्हारा ध्यान। कभी तो होगा दुःख रजनी का मंगल एक विहान। स्वाति बूँद बिनु सीप सम अधर-कमल, मुख म्लान। आकर जीवन सुधा पिला दो बन वियोग वरदान। प्...
लक्ष्मी सी मेरी पहचान
कविता

लक्ष्मी सी मेरी पहचान

शशि चन्दन "निर्झर" इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** लक्ष्मी सी मेरी पहचान। देता देव और इंसान।। भ्रमित कर स्वयं को हर लेता इक दिन प्राण।। मेरी ही कोख से निकल.... पलता वो वक्ष स्थल से.... खोट भर नैनों में फिर... दामन भरता अश्रुजल से।। कभी अग्नि में स्वाह तो कभी पत्थर होना पड़ा।। कभी टुकड़े हुए हज़ार, तो कभी बेघर होना पड़ा।। क्रोध करूं या हास्य करूं। या स्वयं का परिहास करूं।। निर्णय तो करना होगा.... मौन रहूं या विनाश करूं।। सोचती हूं उठा लूं कोरा कागज़, दिखा दूं अपनी कलम की ताकत। ताकि जन्में, जब-जब "कविता".. "दिनकर" आकर छंदों से करें स्वागत।। परिचय :- इंदौर (मध्य प्रदेश) की निवासी अपने शब्दों की निर्झर बरखा करने वाली शशि चन्दन एक ग्रहणी का दायित्व निभाते हुए अपने अनछुए अनसुलझे एहसासों को अपनी लेखनी के माध्यम से स्याह रंग कोरे कागज़ पर उतारतीं हैं,...
मरिचिका
कविता

मरिचिका

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** तपती दुपहरी की सङको पर ङगमगाते पैरो की थाप पर मृग मरिचिका भागती जा रही दूर बहृत दूर, दूर जैसे जिन्दगी से दूर भागता है कोई ऐसे समय हवाओ का बवन्ङर साथ नही देता सिर्फ देखता है अपनी उचाई, अपनी गोलाई रेत के ढेर मे क्षीण काया भटकती है मरिचिका के पीछे जल को खोजती है। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं आप राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "हिंदी रक्षक राष्ट्रीय...
समय का बदलाव
कविता

समय का बदलाव

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** सब कुछ बदल जाता है वक़्त के साथ प्रतिष्ठा, परंपरा, मर्यादा मगर नहीं बदलता व्यक्ति का व्यक्तित्व। सब कुछ चला जाता है वक़्त के साथ अपने, पराये, हमराही मगर नहीं जाता व्यक्ति का अपनेपन का वहम। सब कुछ खो जाता है समय के साथ बचपन, यौवन, पद मगर नहीं खोता अपनों के लिए दिया वक़्त। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिं...
हे राम धरा पर आ जाओ
गीत

हे राम धरा पर आ जाओ

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** हे राम धरा पर आ जाओ, प्रभु फिरती अकुलाई। खोई है मानवता जग ने, कली कली मुरझाई।। ‌ दानवता प्रभु खूब बढ़ी है, रक्षक बनकर आओ। संस्कार सब भूल गये हैं, आकर नाथ सिखाओ।। समरसता का पाठ पढ़ा दो, दूर करो कठिनाई। भ्रष्टाचारी पनप रहे हैं, भ्रष्टाचार मिटा दो। भय से हीन जगत् हो सारा, अत्याचार हटा दो।। अंत करो मन के रावण का, हर उसकी परछाई। राह प्रगति की खोलो सारी, हो संस्कृति संस्थापक। पोषित कर दो धर्म सनातन, प्रभु हो शांति उपासक।। राम-राज्य फिर से आ जाए, सुरभित हो अँगनाई। रघुकुल रीति निभाने वाले, प्रभु हो अन्तर्यामी। तकती राह अहल्या फिर से, दे दो दर्शन स्वामी।। कलियुग के सब कलुष दूर हों, मुक्तिधाम रघुराई । विनती करते रघुकुल भूषण, शरणागत आते हैं। वंदन अभिनंदन हैं प्रभुजी, रामचरित गाते हैं...
नवदुर्गा तुम आ गईं
दोहा

नवदुर्गा तुम आ गईं

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** नवदुर्गा तुम आ गईं, हरने को हर पाप। संभव सब कुछ आपको, तेरा अतुलित ताप।। सद्चिंतन तजकर हुआ, मानव गरिमाहीन। जगजननी माँ दुख हरो, सचमुच मानव दीन।। ममता है तुझ में भरी, तू सचमुच अभिराम। माता जी तेरे सदा, हैं नित नव आयाम।। तू करुणा करती सदा, तेरा पावन नाम। यह जग तेरा है सदा, दुर्गा पावन धाम।। माँ तेरी आराधना, करे सदा कल्याण। नौ रूपों में तुम रहो, पापी खाते बाण।। करते हैं सब साधना, हम सब तेरे लाल। दर्शन दो, हमको करो, हे माँ ! आज निहाल।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए (इतिहास) (मेरिट होल्डर), एल.एल.बी, पी-एच.डी. (इतिहास) सम्प्रति : प्राध्यापक व विभागाध्यक्ष इतिहास/प्रभारी प्राचार्य शासकीय जेएमसी महिला महाविद्यालय प्रकाशित रचनाएं व गतिविधि...
पर्वत जैसा अडिग रहो
कविता

पर्वत जैसा अडिग रहो

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** अडिग रहो तुम, भीड़ की दिशा नहीं विचारों की दिशा चुनो, जहाँ सच कठिन हो, वहीं अपने कदमों का संकल्प बुनो, क्यों भटकते हो नारों में, जब मार्ग तुम्हारे पास लिखा है, भारतीय संविधान की रोशनी में हर उत्तर सुस्पष्ट दिखा है, याद करो वो कर्मपथ, जहाँ शब्द नहीं, संघर्ष बोलता था, भीमराव अंबेडकर का हर एक विचार अन्याय के विरुद्ध डोलता था, और चेतना की मशाल लिए चल पड़ा एक और पथिक महान, कांशीराम ने सिखाया जागृत समाज ही होता है सच्चा बलवान, समता का स्वर केवल कहने से नहीं, जीवन में उतारना पड़ता है, समानता का दीप जलाने को अहंकार खुद ही हारना पड़ता है, बंधुत्व की बात अगर करते हो, तो भेदभाव से रिश्ता तोड़ो, अपने भीतर के छोटेपन को पहचानो, समझो और छोड़ो, युवा हो तुम केवल उम्र से नहीं, विचारों की ...
ऋतुराज बंसत
कविता

ऋतुराज बंसत

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** बसंत आज तू भी है, खिला-खिला सा , निर्मल जल नदियों में बहता, शुद्ध हवा पवन है बहता, खेतों में पीले है फूल, ऋतु को आगाज है करता, ऋतुओ का राजा है बसंत, हरियाली अंगड़ाई लेती, कोयल पपीहा करे है शोर, मन चंचल मदमस्त है रहता, चहूं दिशा हरियाली ओढ़, वन में देखो मोर हे नाचे, बसंत भी देखो इतराए, आमो पर छाया हे मोड, बने हे देखो कान्हा के सिर का मोड, बसंती फूल, बसंती साडू, बसंती राग, बसंती जामा, बसंती रंग से खेले हे कान्हा, बरसाने में देखो फाग, किरण कोर जडी़ है साड़ी, पीले फूल और हरियाली, ओड़े देखो धरती आज, भारत माँ की यही पहचान।। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर्स व्यवसाय : बिजनेस वूमेन विशिष्ट उपलब्धियां :...
मॉं अम्बे गीत
गीत

मॉं अम्बे गीत

शिमला शर्मा "लक्ष्मी प्रिया" ग्वालियर (मध्यप्रदेश) ******************** मातु अम्बे करें नित्य आराधना। ध्यान तेरा धरें हम करें अर्चना। बुद्धि करदो विशद मॉं करें वंदना। नित नवल छंद कविता करें सर्जना। शीश रख दो वरद हस्त मॉं शारदे, छंद - निर्झर बहा दो करें याचना।। मातु अम्बे करें नित्य आराधना। ध्यान तेरा धरें हम करें अर्चना। जाह्नवी कर्म यमुना बहे संग में। मानसी शारदा संगमी अंग में।। तीर्थ संगम बना दें सफल शारदे, भाव से भारती माॅं करूॅं साधना।। मातु अम्बे करें नित्य आराधना। ध्यान तेरा धरें हम करें अर्चना।। आप से ही चले मातु संसार यह। है दुखी ये हिया मॉं करो प्यार है।। आप जननी जगत की हरो कष्ट सब, टूट जाऊॅं नहीं बाॅंह को थामना। मातु अम्बे करें नित्य आराधना। ध्यान तेरा धरें हम करें अर्चना।। परिचय :- श्रीमती शिमला शर्मा "लक्ष्मी प्रिया" निवासी ...
नवरात्रि
दोहा

नवरात्रि

डॉ. भावना सावलिया हरमडिया, राजकोट (गुजरात) ******************** आई माँ विश्वंभरी, आज तुम्हारे धाम। भटक गए हम राह हैं, बाँह लीजिए थाम।। नौ दुर्गा माँ को नमन, करते बारंबार। जोडे दोनों हाथ हम, खड़े तुम्हारे द्वार।। प्रथम शैलपुत्री तुम्हें, करते नित्य प्रणाम। जगत नियन्त्री शक्ति का, हम रटते हैं नाम।। ब्रह्मचारिणी शक्ति हे, सविनय तुम्हें प्रणाम। मन में जलता भक्ति का, दीपक आठों याम।। करो चंद्रघंटा सदा, प्रेम-भक्ति संचार। द्वेष-भाव को दूर कर, दो पावन संस्कार।। माँ कूष्माण्डा त्याग का, मन में हो विस्तार। मानवता के द्वार से, रहे बरसता प्यार।। करो स्कंदमाता सदा, दोष हृदय के दूर। जनहित की शुभ भावना, मन में हो भरपूर।। हे माता कात्यायनी, सबकी पालनहार। पाप मिटाकर जीव का, शीघ्र करो उद्धार।। कालरात्रि माता करो, दुष्टों का संहार। हे जगदंबा शक्ति तुम, हो सबका आधार।। शि...
शिव-शक्ति श्रृंगार
स्तुति

शिव-शक्ति श्रृंगार

बाल कृष्ण मिश्रा रोहिणी (दिल्ली) ******************** विराजमान भाल चंद्र, गंग धार मस्तकम्, प्रिये सुअंग गौरि वाम, शोभते सुहस्तकम्। सुगंध पुष्प माल कण्ठ, मुण्ड माल राजते, अनंत प्रेम रूप देखि, कामदेव लाजिते ॥१॥ ललाट नेत्र दग्ध काम, भस्म अंग लेपनम्, उमा विलोकि मुग्ध भाव, अर्पते सुजीवनम्। मृदंग ताल डमरूअं, निनाद व्योम गुंजते, सुरेश देव दानवा, सप्रेम पाद पूजते ॥२॥ सुवर्ण वर्ण शैलजा, कपूर गौर शंकरम्, विचित्र सौम्य रूप धार, मोहते चराचरम्। सुहाग भाग माँग बीच, सेंदुरं सुसोभितं, प्रसन्न चित्त देखि भक्त, होत मोद मोहितं ॥३॥ नगाधिराज पुत्रिका समक्ष देव देवताम्, अनन्त कोटि सृष्टिदां नमामि शक्ति रूपिणीम्। जटा कलाप मध्य बाल, चंद्रिका चकाचुपं, निहारि गौरि रूप सौम्य, भूलि जात आपुपं ॥४॥ झुलात प्रेम-दोलना हिमालयं सुशृंग में, अनंत रंग घोरि-घोरि भीजतें सुअंग में। न वर्ण्यते मु...
है शारदे तार दो।
स्तुति

है शारदे तार दो।

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** है विनय, आपसे, शारदे तार दो। द्वार हम, हैं खड़े, शारदे प्यार दो।। ज्ञान हो, ध्यान हो, वेद की साधना। हम करें, नित्य ही, मातु आराधना।। तेज हो, सूर्य सा, कर कृपा हैं शरण। नंदिता, पूजिता, हैं गिरे हम चरण।। मीत हो, जीत का, आप उपहार दो। द्वार हम, हैं खड़े, शारदे प्यार दो।। राह हम, जो चलें, सत्य का पाथ हो। द्वेष मन, में न हो, श्रेष्ठ का साथ हो।। हो हृदय, भी विमल, मातु भयहारिणी। मंत्र हो, प्रेम का, हो जगततारिणी।। कंठ पे, नाम हो, माँ अमिय धार दो। द्वार हम, हैं खड़े, शारदे प्यार दो।। यह धरा, देश की, मातु है पावनी। ताज हो, सिर सदा, शांति की आसनी।। हम सदा, हों सफल, पूर्ण हर काम हो। ओम ही, ओम हो, माँ अमर नाम हो।। पाप का, नाश हो, हाथ तलवार दो। द्वार हम, हैं खड़े, शारदे प्यार दो।। पाठ हम, तो पढ़े, म...
जिंदगी की सीख
कविता

जिंदगी की सीख

चेतना सिंह प्रकाश "चितेरी" प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) ******************** जिंदगी रुला रही है-रो लें, जिंदगी हँसा रही है-हँस लें। जिंदगी अभिनय करा रही है- मुस्कुरा निभा लें, जिंदगी एक सफर है- अनंत की ओर बढ़ चलें। जिंदगी मुसाफिर है इस संसार में, आना-जाना इसका नियम पुराना है। रुक न पाया कोई यहाँ कभी, यादों का ही बस खजाना है। यहीं मोह का बंधन है, गहरे रिश्तें भी टूट जाना है । अपनों का बिछड़ना- यहीं रोना है। सबको एक दिन छोड़ जाना है, चाहे जितना चाहें भी कुछ न भूल पाना है। परिचय :- चेतना सिंह प्रकाश "चितेरी" निवासी : प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपन...
जाने की जल्दी
कविता

जाने की जल्दी

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** फर्राटे भरती कार, बाइक, ट्रक, हर ओर बिखरी है आपाधापी, होड़ है आगे निकल जाने की, आगे वालों को भी पछाड़ आने की। जिंदगी बन गई है महज़ रफ्तार, चाहे शांत कछुआ हो, या फुर्तीला चीता, या चालाक सियार। संभलो- ज़रा ठहरो, एक पल ब्रेक लगाओ, सुरक्षित आओ, सुरक्षित जाओ। क्या पता यह जाने की जल्दी तुम्हें कहीं दूर ले जाए, इतना दूर- जहाँ से लौटने की कोई राह न आए। यह दौड़ किसे दिखानी है? किसे हराने की ठानी है? हिरण-सी दौड़ में कौन-सी कस्तूरी पाना है? और इस अकड़े हुए अहंकार से आख़िर किसे झुकाना है? कहते हो- जिंदगी कम पड़ जाती है जीने को, फिर क्यों अनदेखा करते हो इन धड़कनों, इन जख्मों को सीने में सीने को? भाई, जीवित रहोगे- तो हर मंज़िल पा जाओगे, पर अगर रफ्तार को ही चुन लिया, तो रास्ते ही तुम्ह...
यादें
कविता

यादें

काजल कुमारी आसनसोल (पश्चिम बंगाल) ********************110 कभी-कभी कुछ रिश्ते बहुत खूबसूरती से शुरू होते हैं, पर वक़्त के साथ वही रिश्ते सबसे ज़्यादा रुला जाते हैं। शुरुआत में हर बात अपनी लगती है, फिर अचानक हालात ऐसे बनते हैं कि दूरी मजबूरी बन जाती है। ना कोई ग़लती साफ़ दिखाई देती है, ना ही कोई पूरी तरह बेगुनाह होता है। कभी कोई बदल जाता है, तो कभी हालात इंसान को बदल देते हैं। वो वादे, वो कसमें सब अधूरी रह जाती हैं, और हम चाहकर भी उन्हें पूरा नहीं कर पाते। धीरे-धीरे अजनबी बन जाते हैं, जिन्हें कभी अपनी जान से ज़्यादा चाहा था। सबसे दर्दनाक बात ये होती है कि ना वो पास होते हैं, ना हम उनसे दूर हो पाते हैं। बस यादों में जीते रहते हैं, और सोचते हैं। अगर मिलना ही नहीं था, तो किस्मत ने मिलाया ही क्यों ... परिचय :- काजल कुमारी निवासी : ...
माता के नवरूप
कविता

माता के नवरूप

उषाकिरण निर्मलकर करेली, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** प्रथम दिवस नवरात्र का, सजा मातु दरबार। शैलसुता माता सदा, करती है उपकार।।१।। दूजे दिन आराधना, ब्रम्हचारिणी रूप। संयम तप वैराग्य की, देवी छटा अनूप।।२।। माँ के मस्तक पर सजा, चंद्र घंट आकार। मात चंद्र घंटा करे, असुरों का संहार।।३।। आलोकित ब्रह्मांड है, जिनके तेज प्रताप। माँ कुष्मांडा जाप से, मिटे शोक सब पाप।। ४।। स्कन्दमात सुमिरन करो, पंचम दिन नवरात। शुभ्र वर्ण पद्मासना, शुभता की सौगात।।५।। षष्टम माँ कात्यायनी, सिंह पर है आरूढ़। माँ महिषासुर मर्दिनी, महिमा जिनकी गूढ़।।६।। कालरात्रि माता भजो, शुभंकरी शुभ नाम। रक्तबीज आतंक को, जिनसे मिला विराम।।७।। महाशक्ति फलदायिनी, करे सदा कल्याण। अष्टम दिन गौरी भजो, माँ भक्तों की त्राण।।८।। मात सिद्धिदात्री तुम्हें, बारम्बार प्रणाम। नवम रूप में मातु को, पूज...
नीम का पेड़
कविता

नीम का पेड़

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** हर साल की तरह नवोदित हुई एक नई सुबह ले आई जीवन का एक नव वर्ष नव चिंतन, नव मनन ले नव आशाओं का दीप.... जलते ही आस-दीप मानो सिमट गये हों जीवन के अंधेरे मगर ये प्रकाश उघाड़ गया जीवन के प्रत्यक्ष-परोक्ष तन, मन पर लगे आघाती घावों को एक पल खुशी हुई अतीत के सुनहरे पल देख तो कभी व्यथित हुआ मन छद्म हंसी के दुशाले के आवरण में छिपे रेशा-रेशा, रिसते दर्दीले घावों को.... मगर मन ने आज जाना सच्चा साथी है कौन..? वो है मेरा हम उम्र दालान में खड़ा नीम का पेड़ जिसने पिया है छिप-छिप मेरे तिक्त आँसूओ का जल और.. बदलते कैलेंडर में भी मुस्कुराता रहा है और.. होने दिया खारा अपने ही अस्तित्व को मुस्कान स्वरूप रहा हरा-भरा... साक्षी था मेरे हर गुण-दोष रक्त के ढक लेता था सब अपने हरे पत्तों के जाल ...
श्री पार्वती शक्ति तांडव स्तुति
स्तुति

श्री पार्वती शक्ति तांडव स्तुति

बाल कृष्ण मिश्रा रोहिणी (दिल्ली) ******************** कुचेल-केश-पाश-बद्ध-मल्लिका-सुगन्धिनी, उमेश-वाम-भाग-नित्य-केलि-कंज-धारिणी। अशोक-पुष्प-पल्लवैः सु-रञ्जित-स्व-मूर्धनी, करोतु शक्ति-ताण्डवं सदा शिवा भवानी ||१|| ललाट-बिन्दु-सिन्धु-रक्त-रञ्जिता-स्व-भालका, धनुर्धरा त्रिशूलिनी कपाल-पाश-धारिणी। कराल-काल-मर्दिनी समस्त-दुःख-हारिणी, नमामि शैल-पुत्रिणीं सदा शिवा भवानी ||२|| रणत्-क्वणत्-कणत्-किङ्किणी-नूपुर-घोष-मण्डिता, चलत्-चलत्-पद-क्रमैः सु-विश्व-चक्र-चालिनी। अघोर-रूप-धारिणी घोर-शत्रु-घातिनी, प्रचण्ड-शक्ति-रूपिणी सदा शिवा भवानी ||३|| जगज्जननी पावनी प्रसन्न-मन्द-हासिनी, सु-भक्त-वृन्द-वन्दिता समस्त-विघ्न-नाशिनी। प्रलय-वह्नि-रञ्जिता महानिभय-दायिनी, जयतु जयतु पार्वती सदा शिवा भवानी ||४|| जटा-कटाह-संभ्रम-भ्रमन्-निलिम्प-निर्झरी, विलोम-शक्ति-रूपिणी कराल-खड्ग-धारिणी। धगद्...
सफेद पोश
कविता

सफेद पोश

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** आज समाज के सभागारों में खामोशी का साम्राज्य क्यों है, सफेदपोश चेहरों पर सन्नाटा, अंतरमन में आज भी राज क्यों है। जब अन्याय की आंधी चलती है, दीपक भी कांपने लगते हैं, पर विचारों के सूर्य होकर भी, ये लोग मौन में ढलने लगते हैं। भीष्म, पांडव, विदुर की तरह सब दृश्य निहारते रह जाते हैं, सत्य सामने रोता रहता, ये कर्तव्य से नज़र चुराते हैं। कलम जिनकी तलवार थी, आज म्यान में सोई क्यों है, विवेक की आवाज़ होते हुए भी, अंतरात्मा खोई क्यों है। सम्मानित मस्तिष्कों का मौन, समाज को पीड़ा देता है, जब प्रहरी ही सो जाए तो, अन्याय खुलकर जीता है। उठो, तुम्हारी वाणी में ही परिवर्तन का सार छिपा है, मौन तो केवल बंधन है, सत्य बोलना ही असली तप है। परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : 25 अप्रैल निवास : आबिदजान (अफ्रीका) मू...
जीवन की लीला
कविता

जीवन की लीला

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** जीवन का खेल है खूब निराला अमृत म घुलता विष का प्याला कहीं अमृत का लाजबाव स्वाद निस्वार्थी का वही महाप्रसाद ।।१।। सांस जबतक, आस तबतक ईश्वर की भक्ति है जप और तप ।।२।। स्वार्थ का भरता जीवन संसार भ्रमित क्यों करो त्वरित दरकिनार जीवन जब अविराम चलती गाड़ी असीम आंनद, सच्ची होती खाड़ी ।।३।। राह पाने में बने जो स्वर्थी खिलाड़ी भ्रमित भाषा में कहे, है वो अनाड़ी।।४।। राह को मतलबी जीवन क्यों बनाते जीवन में स्वयं रोढ़ा, दिख आते दुख वेदनाओं का ज्ञान समझ पाते जीवनसंसार की लीला समझ जाते ।।५।। कामक्रोध लोभमोह की मौजमस्ती जीवन में बन जाती है हरदम सस्ती उदारता त्याग सेवाभाव करुणाप्यार यहीजीवनसाथी, यही सच्चा संसार।।६।। परिचय :- ललित शर्मा निवासी : खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) संप्रति : वरिष्ठ पत्रकार व लेखक घोषणा पत्...
ये दौर और है
कविता

ये दौर और है

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** जीना है चैन से तो मिलजुलकर रहो, गर पता हो राज की कोई बात तो इशारों में भी न बताओ मुंह सिलकर रहो, एकलव्यों मुगालते में न रहना हर शाख पर चिपके हुए हैं द्रोणाचार्य, बिना बताए कब काट ले अंगूठा जो मुस्तकदिल के लिए न हो स्वीकार्य, मुट्ठी भर मस्तिष्क रहते हैं सदा सक्रिय, सूर्य की दिशा मोड़ सकते हैं कभी भी जब आ जाए अपने लिए स्थिति अप्रिय, अब सोचो जरा क्या व कैसा हो कदम, मिले कामयाबी और टूटे न मन का भरम, झूठों और शोषेबाजों का है अब तो दौर, साथ न दो तो शायद बचे न कोई ठौर, गिरवी रहने दो अपना मन मस्तिष्क, विरोध से मिट न जाए बचा खुचा भविष्य, तो मिलाओ उनके हां में हां, बचा रह जाए शायद अपना और अपनों की जां, झूठ खूबसूरत और यकीं लायक है ये वक्त काबिले गौर है, ये दौर और है, ये दौर और है। ...
नैनिका
कविता

नैनिका

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** प्यारी इस मुस्कान पर, सब जाते बलिहार। अधरों पर उँगली रखी, बहती है रसधार।। बहती है रसधार, माथ ज़ुल्फें घुँघराली। मिश्री जैसे बोल, बड़ी है भोली- भाली।। लाल-लाल हैं गाल, देख आँखें कजरारी। करते सभी दुलार, नैनिका लगती प्यारी।। जाती शाला नैनिका, बरसे सावन झूम। बारिश से बचके चली, माँ का माता चूम।। माँ का माथा चूम, लगाती बचने छाता। होती गीली फ्राक, मगर सावन है भाता।। हर पग रखे सँभाल, बूँद रिमझिम है गाती। हर्षित होकर आज, नैनिका शाला जाती।। पानी में सँग खेलती, निशदिन करे दुलार। मछली भाती नैनिका, करती उसको प्यार।। करती उसको प्यार, खिलाती उसको दाना। निहिरा रहती साथ, मधुर फिर गाती गाना।। रंग-बिरंगी मीन, कहें सब जल की रानी। देती है संदेश, सुनो जीवन है पानी।। परिचय :- मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी...