नोहर की बदलती आबोहवा
इंद्रजीत सिहाग "नोहरी"
गोरखाना, नोहर (राजस्थान)
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भूल गए बिहानी का वैभव, भूला वो सम्मान यहाँ,
भगतसिंह के नाम पे सिसक रहा ईमान यहाँ।
परशुराम चौक की गरिमा, अब धुएं में खोई है,
नोहर की ये पावन माटी, आज अकेले रोई है।
वो गोल गटा कुआं जहाँ, जुटती थी टोलियां कभी,
आज वहां सट्टे की लत ने, छीनी सबकी खुशियां सभी।
शिवाजी स्टैंड की चौखट पर, कैसा ये मंजर आया है,
नोहर की गलियों के साये में, डोडों का व्यापार समाया है।
न लाज रही बुजुर्गों की, न खौफ रहा अब शासन का,
हर नुक्कड़ पर खेल चल रहा, नशीले उस राशन का।
जहाँ गूंजते थे नारे आज़ादी और क्रांति के,
वहां सौदा हो रहा है आज, समाज की शांति के।
घर की दहलीज लांघ कर, अब नारी भी कदम बढ़ाती है,
चंद रुपयों की खातिर वो, ज़हर घरों तक लाती है।
मैली हवा में हाथ धोना, अब दस्तूर बन गया,
जो शहर कभी था हीरा, वो आज नासूर...



















