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व्यंग्य

खुदा ही खुदा है
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खुदा ही खुदा है

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** खुदा की तलाश किसे नहीं? जिसे भी हो, वह हमारे शहर,गड्डापुर, आ जाए। यहाँ तलाश शर्तिया पूरी होगी। गारंटी वैसी ही, जैसी दाद-खाज, खुजली, भगंदर, नपुंसकता और खोया प्यार लौटाने वाले विज्ञापन देते हैं। गड्डापुर में खुदा मंदिर-मस्जिद में कम, गली-सड़क पर अधिक मिलता है। फर्क इतना है कि यहाँ खुदा दिखता नहीं, पैर पड़ते ही महसूस होता है। कहीं सीवर लाइन का खुदा, कहीं अमृत जलधारा का खुदा, कहीं बिजली विभाग का खुदा, तो कहीं नगर परिषद का सर्वधर्म समभाव वाला खुदा। पूरा शहर खुदामय है। विकास और खुदाई का चोली-दामन का साथ है। जहाँ विकास आएगा, वहाँ पहले धरती का सीना खुलेगा। पुल बनेंगे, सड़कें बनेंगी, टावर खड़े होंगे, स्टेशन अमृतमय होगा, तो खुदाई अनिवार्य है। रेलवे का ‘अमृत स्टेशन’ प्रोजेक्ट आया तो हमारे स्टेशन ...
सतरंगी दुनिया – २९
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सतरंगी दुनिया – २९

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ********************  वास्कोडिगामा अगर शादी-शुदा होता तो को कभी भी भारत की खोज नहीं कर पाता, क्योंकि कहां जा रहे हो ? कहाँ से आ रहे हो ? किसके साथ जा रहे हो ? कब वापस आओगे ? मुझे भी साथ ले चलो। मेरे लिए वहाँ से क्या लाओगे ? ये सब सवाल पूछने वाली पत्नी उसके पास नहीं थी। कभी साथ बैठोगे तो अपने दर्द बताएंगे, यूँ फोन से पूछोगे तो खैरियत ही बताएंगे। अब दुनिया भरोसे लायक नहीं रही, क्योंकि लोग अब कसम खाकर भी झूठ बोलते हैं। *उम्र से पहले ही बड़े हो जाते हैं वो बेटे, जिन्हें बाप से दौलत नहीं, बल्कि जिम्मेदारियाँ मिलती हैं।* आजकल नींद भी बदल गई है, अब सपने नहीं आते। अब तो थकान सुलाती है, और जिम्मेदारियाँ उठाती है। मैं वो समझदार हूँ, जिसे पता है कि मुझे किसने, कब और कितना बेवकू‌फ बनाया था। *भारत में सिर्फ १ प्रतिशत लड़कियाँ क्रिकेट, टैनिस, हॉकी और ...
दास्तान-ए-सांड
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दास्तान-ए-सांड

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** मेरा जन्मदिन अभी दूर है, लेकिन हमारे यहाँ जन्मदिन की तैयारियाँ किसी चुनाव से कम नहीं होतीं-घोषणापत्र पहले, कार्यक्रम बाद में। इस बार तय हुआ है कि गायों को चारा और गुड़ खिलाकर जन्मदिन मनाया जाएगा। शहर में इन दिनों गौ-प्रेम फैशन में है। हर मोहल्ले में गौ-आश्रम उग आए हैं-कुछ श्रद्धा से, कुछ फोटो से और कुछ फेसबुक प्रेमियों के सेवा सेल्फी प्रेम से। जब से हमारे योग-गुरु बाबा ने सौंदर्य प्रसाधन से लेकर दवा-दारू तक में गाय का तड़का लगाया है, गाय पाँच सितारा शो-रूम की वस्तु बन चुकी है। देसी गाय अब श्रद्धा की नहीं, औकात की चीज़ हो गई है। गाय से हमारा रिश्ता नया नहीं है। बचपन से पाठ्यक्रम में थी-“गाय हमारी माता है।” निबंध में, उपलों में, होली की बालुडियों में, और सुबह के मक्खन में गाय बराबर मौजूद ...
सतरंगी दुनिया- २८
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सतरंगी दुनिया- २८

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ********************  पत्नी ने घर में ज्यादा खाना बनाया तो पति ने पूछा कि घर में खाने वाले हम ३ लोग हैं, फिर तुमने ढेर सारा खाना किसके लिए बनाया है। पत्नी ने प्यारा-सा उत्तर दिया,- मुझे बचे हुए भोजन से विविध व्यंजन बनाने की विधि सीखनी है। आजकल की नौकरानी का हाल देखिए, मालकिन ने नई नौकरानी को समझाते हुए कहा, देख मैं ज्यादा बोलना पसंद नहीं करती। अगर में अंगुली का इशारा करूं तो समझ लेना कि में बुला रही हूँ। नौकरानी बोली,- मैडम मैं भी ज्यादा बोलना पसंद नहीं करती। अगर मैं सर हिला दूं तो आप समझ लेना कि मैं नहीं आ सकती। *एक ६० साल की उम्र वाले व्यक्ति की टी शर्ट पर एक शानदार वाक्य लिखा था- मेरी उम्र ६० साल नहीं है, मैं तो केवल १६ साल का हूँ ४४ साल के अनुभव के साथ। इसे कहते हैं नजरिया।* परमात्मा कभी किसी का भाग्य नहीं लिखता है, बल्कि जीवन के ...
देवलोक का अमृतकाल बनाम मृत्युलोक में मानवता का पतनकाल
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देवलोक का अमृतकाल बनाम मृत्युलोक में मानवता का पतनकाल

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** देवराज इंद्र की सभा सजी थी। देवलोक में "अमृतकाल महोत्सव" चल रहा था। अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं, अमरबेल के पुष्प बरस रहे थे और सोमरस की स्टॉल पर ऐसी भीड़ थी जैसी मृत्युलोक में तंदूरी रोटी की दुकान पर लगती है। तभी सभा में देवर्षि नारद का आगमन हुआ। इंद्र ने मुस्कुराकर कहा, “अहोभाग्य! आजकल तो आपका अधिक समय मृत्युलोक में ही बीतता है। कहीं किसी गठबंधन सरकार में मंत्री पद मिल गया क्या?” नारद ने कटाक्ष अनसुना कर पूछा, “देवराज, बताइए, देवता, दानव और मानव में श्रेष्ठ कौन है?” इंद्र चौंके, “अब आप भी हमारी श्रेष्ठता पर प्रश्न उठाने लगे? कहीं मृत्युलोक की विपक्षी शक्तियों ने आपको प्रभावित तो नहीं कर दिया?” नारद मुस्कराए, “नहीं इंद्र, पर सत्य यही है कि आज सबसे शक्तिशाली मानव है। उसने अपना अलग संसार ब...
सतरंगी दुनिया -२६
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सतरंगी दुनिया -२६

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** *अजीब बात है, कि वो इंजीनियर नहीं है फिर भी तारीफ के पुल बाँध लेता है।* हँसना स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद है, पर दूसरों पर हँसना हमारे लिए हानिकारक है। उम्र बढ़ने के साथ हमें यह नहीं सोचता चाहिए कि हम ओल्ड हो गए हैं, बल्कि ऐसा सोचना चाहिए, कि हम तपकर गोल्ड हो गए हैं। उमर कहती है कि अभी थोड़ी भक्ति कर ले, पर दिल कहाँ है, मानता वो तो कहता है कुछ मस्ती कर ले। *यदि आप उम्र को हराना चाहते हैं, तो आप अपने शौक जिन्दा रखिए।* यदि आप खुश रहना चाहते हैं तो इस बात पर ध्यान मत दीजिए कि कौन क्या कर रहा है, कब कर रहा है और क्यों कर रहा है ? अब मुझे उम्र समझाती है कि अब जिंदगी की शाम हो गयी है, परतुं दिल कहता है कि महफिल तो शाम को ही शुरू होती है। बुढ़ापे में भी जवानी का जोश रखिए। माना हमारा तन कछुआ होता है, मगर जनाब हमारा मन तो खरगो...
चिंता शिविर
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चिंता शिविर

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** आज तड़के ही पड़ोसी शर्मा जी आ धमके। हाथ में मेरा वही अख़बार था, जिसे वे रोज़ की तरह “पढ़ने के लिए उधार” ले गए थे और पढ़कर अब “ज्ञान बाँटने” लौटाए थे। अख़बार के भीतर से एक पम्पलेट भी झाँक रहा था, मानो वह स्वयं शर्मिंदा हो कि अख़बार के साथ ग़लती से लौट आया है। हमारे शर्मा जी पड़ोसी धर्म का पूरा निर्वाह करते हैं, अख़बार मेरा, पढ़ते वे; चाय मेरी, पीते वे; और अखवार की ख़बरें ऐसी सुनाते हैं जैसे स्वयं रिपोर्टर हों। आज चाय की पहली चुस्की के साथ उन्होंने पम्पलेट मेरी ओर बढ़ाया, “आप तो वैसे भी अख़बार नहीं पढ़ते, कम से कम पम्पलेट ही देख लिया करो। शहर में बड़ा ज़रूरी कार्यक्रम होने जा रहा है।” मैंने सहज अनुमान लगाया, “कोई नया शो-रूम, चमत्कारी वैद्य, असफल प्रेम को सफल करने का कोर्स, या फिर किसी ...
सतरंगी दुनिया – २५
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सतरंगी दुनिया – २५

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ********************  आज प्रधानमंत्री द्वारा देश की जनता से जो निवेदन किया गया, उसका असर अब दिखने लगा है। आज सुबह-सुबह कामवाली बाई का फोन आया- बर्तन, कपड़े मेरे घर-घर भेज दो। मोदी जी ने वर्क फ्राम होम का आर्डर दिया है। *जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, छोटे अक्षर दिखाई नहीं देते। शायद यह एक इशारा ही है, कि बढ़‌ती उम्र के साथ छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज करें।* इस दुनिया में खुश वही लोग हैं, जो स्वयं का मूल्यांकन करते हैं, और दुखी वो हैं, जो दूसरों का मूल्यांकन करते हैं। अजीब बात है कि एक पत्थर एक बार मंदिर जाने पर भगवान बन जाता है, परन्तु इंसान हजार बार मंदिर जाता है पर इंसान नहीं बन पाता है। अपने रिश्तों की बगिया में एक रिश्ता नीम के पौधे जैसा भी रखिए, जो सीख भले ही कड़वी देता है, पर तकलीफ में मरहम का काम करता है। *आधुनिक युग मिलावट का युग है। सब...
वो आ रहे हैं देखने के लिए
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वो आ रहे हैं देखने के लिए

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** “सुनो, आज शाम चार बजे दूसरी पार्टी आ रही है… देखने के लिए।” “अच्छा...! फिर वही घबराहट शुरू हो गई। कहीं ये भी पहली पार्टियों की तरह...! देखो, ऑफिस से किसी को भेज दो, उन्हें रास्ते से ही ले आए। कहीं लोकेशन पूछते-पूछते पड़ोसियों के चंगुल में न फँस जाएँ। मुझे डर है कि वहाँ पहुँचकर कहीं आसपास पड़ोस से पूछताछ न कर लें, पहले की तरह... उन्हें बहका न दे... पड़ोसी बदनाम करने में सबसे आगे रहते हैं... पहले भी न जाने कितनी पार्टियों को बहकाया है।” बात सही थी। कई पार्टियाँ पहले भी आईं। चाय पी, नाश्ता किया, मुस्कराईं, कागज़ देखे और जाते-जाते कह गईं, “मीडिएटर को बता देंगे।” मीडिएटर ने भी जाते-जाते ऐसा आश्वासन दिया, जैसे बारात बस दरवाज़े पर ही खड़ी है। पर चार दिन बीत गए, न हाँ आई, न ना। अब आदमी इंतज़ार...
सतरंगी दुनिया- २३
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सतरंगी दुनिया- २३

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ********************  जो लोग आपको नहीं समझते- उन्हें मत सममझाइए। समुंदर खारा है-खारा ही रहेगा, उसमें शक्कर मत मिलाइए। हम अक्सर खून की जांच करवाकर देखते हैं, कि शरीर में कैल्शियम और विटामिन घट तो नहीं रहे हैं। मेरे ख्याल से कभी ऐसे अपने व्यक्तित्व की भी जाँच करवा लेनी चाहिए। क्या पता दया, करुणा, मानवता, दोस्ती और इंसानियत भी घट रही हो। याद रखिए- तारीफ करने वाला आपकी स्थिति देखता है और परवाह करने वाला आपकी परिस्थिति देखता है। *भुट्टा बेचने वाला फूट-फूट कर रोया, जब एक एक मार्डन लड़‌की ने कहा- अंकल एक हैंडिल वाला पापकॉर्न देना।* हमारे साथ अक्सर वही लोग चलते हैं, जिन्हें हमसे फायदा नहीं बल्कि हमारी फिक्र होती है। १९९० में लड़कियाँ डरती थी कि सास कैसी मिलेगी ? २०२० में सास डर रही है, कि बहू कैसी मिलेगी ? देखिए अजीब संजोग कि जो लड़‌कियाँ १९९० ...
अगले जनम मोहे एनआरआई कीजे
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अगले जनम मोहे एनआरआई कीजे

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** आजकल का सबसे बड़ा अचीवमेंट क्या है? बस यही कि एनआरआई बन जाओ, या कोई एनआरआई दामाद घर ले आओ। मन में पहले कभी ऐसा कोई भाव नहीं था, पर पड़ोसी और रिश्तेदारों ने इतनी बार टोंट बाजी की कि मन में एक टीस-सी बस गई। हर तीसरे दिन कोई न कोई टोक देता, “यार, तुम एनआरआई क्यों नहीं बने? वहां डॉक्टरी में ज्यादा पैसा, ज्यादा ठाठ है !” कॉलेज के दिनों में देखा, कई साथी युएस एम्एलए की तैयारी ऐसे करते थे जैसे भारत की हवा से उन्हें अचानक एलर्जी हो गई हो। शरीर उनका भले यहाँ हो, पर आत्मा अमरीका-यूरोप की सड़कों पर ही टहलती रहती थी। शायद उनकी आत्मा को ग्रीन कार्ड पहले ही मिल चुका था। हमारी आत्मा जिद्दी निकली, इसे तो हमसे अलग होना ही नहीं था। हमने लाख मनाया, “जरा बाहर घूम आओ, कम से कम तुमको तो वीज़ा नहीं चाहिए।” आ...
जन सेवक- जनता
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जन सेवक- जनता

कमल किशोर नीमा उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** हम जनता है, जन सेवक बनाना हमारा मौलिक अधिकार है ।जन सेवक बनने के लिए किसी को भी कोई विश्व विद्यालय की डिग्री की आवश्यकता नहीं है। जन सेवक बनने की शुरुआत अपने क्षेत्र मे छोटे-छोटे अपराधों जैसे कोई मारपीट या छेड़खानी आदि से शुरू कर सकते है। आप को कुछ माह की जेल भी हो सकती है लेकिन आपको कोई चिंता नहीं करनी चाहिये क्योंकि जेल मे रहकर वहाँ का अनुभव आप को आगे भी काम आयेगा। जेल मे रहने से आपकी पहचान पुलिस महकमे के साथ साथ बड़े अपराधियों से भी होगी जिससे आप को हौसला मिलेगा और आप आगे बढ़ेंगे। आप बड़े अपराध जेसे हप्ता वसूली शहर के बड़े लोगों को डराने, भू माफियाओं आदि के काम से आपका नाम अख़बारों मे व टीवी चैनलों के माध्यम से फेमस होगा। यदि आप लोगों की भावनाएं भड़का कर दंगा फसाद करवाते है तो इससे भी आप को कोई परेशानी नहीं होगी क्योंकि पुलिस आ...
सतरंगी दुनिया- २२
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सतरंगी दुनिया- २२

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** *ज़िंदगी को ठंड और घमंड दोनों से बचाकर रखना चाहिए, क्योंकि दोनों ही परिस्थितियों में आदमी अकड़ जाता है।* हम लोग घर के दरवाजे पर शुभ-लाभ लिखते हैं। केवल शुभ-लाभ लिखने से कुछ नहीं होगा। शुभ विचार रखिए अपने लिए भी और दूसरों के लिए भी, फिर लाभ ही लाभ होगा। भगवान ने हर इंसान को किसी वजह से बनाया है, इसलिए खुद को स्पेशल समझना शुरू कर दो। *वाणी और विचार ये दोनों प्रोडक्ट हमारी खुद की कम्पनी के हैं। इनकी क्वालिटी जितनी अच्छी रखेंगे, कीमत उतनी ही ज्यादा मिलेगी।* भिखारी भी कभी-कभी विशेष जवाब देकर सोचने को मजबूर कर देते हैं। एक व्यक्ति प्रतिदिन भिखारी को दस रुपए देता था। अचानक पिछले कुछ दिनों से उसने भिखारी को एक रूपया प्रतिदिन देना शुरू कर दिया। भिखारी ने कारण पूछा तो उस व्यक्ति ने बताया कि अब उसकी शादी हो गयी है। तब भिखारी न...
नेताजी कर्मदास की कैंची लीला
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नेताजी कर्मदास की कैंची लीला

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** नेताजी कर्मदास बड़े कर्मयोगी हैं। कर्म और कर्मफल, दोनों में उनका अटूट विश्वास है। बस फर्क इतना है कि उनके कर्म का केंद्र न राष्ट्र है, न जनकल्याण, वे तो एक ही महान कर्म के लिए अवतरित हुए हैं, वो कर्म है ‘फीता काटना।‘ दिन में दो-चार फीते न कटें तो उनकी उंगलियाँ ऐसे फड़कती हैं जैसे बिना दाना देखे कबूतर बेचैन हो उठे। जेल हो या जिम, अस्पताल हो या शोरूम,बस मंच सजा हो, फीता तना हो और कैमरे तैयार हों, नेताजी अपने कर्म-प्रदर्शन के लिए तत्पर खड़े मिलेंगे। उनके अनुसार फीता काटना पतंग के पेंच लड़ाने से भी अधिक कौशलपूर्ण कार्य है। वे न सुई से, न तलवार से, सिर्फ कैंची से, एक दिन राजनीति की चाँदी काटने का सपना संजोए बैठे हैं। एक बार किसी कार्यक्रम में उन्हें भोंथरी कैंची थमा दी गई। फीता झटके से न कटा ...
संतरंगी दुनिया- २०
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संतरंगी दुनिया- २०

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** यदि आप अपनी पत्नी को खुश रखना चाहते हैं तो अपने पर्स का मुँह खुला रखें और अपना मुँह बंद रखें। वक़्त बदल गया है, पहले लड़कियाँ सफेद घोड़े पर राजकु‌मार की कल्पना किया करती थी, आजकल बीएमडब्ल्यू में गधा भी आ जाए तो चलता है। *दुनिया में सिर्फ एक दिल ही है, जो बिना रूके काम करता है; इसलिए दिल को खुश रखो, वो आपका हो या पराया।* कोई इंसान अगर आपको केवल जरूरत पड़‌ने पर याद करता है, तो उस बात का बुरा मत मानिए, क्योंकि जब अंधेरा हो जाता है, तभी दीए की याद आती है। डाकू और नेता दोनों ही डाका डालते हैं, पर देखिए- डाकू को कारावास मिलता है और नेता को कार-आवास !! *हमारे देश में लॉजिक कोई नहीं मानता, सबको मैजिक चाहिए, इसलिए यहाँ साइंटिस्ट के बजाय बाबा फेमस है।* मैं नास्तिक हूँ, क्योंकि मैंने धर्म की आड़ में धंधे देखे हैं; ईश्वर नहीं। हमार...
चुनाव में खड़े होने का नहीं, बैठने का मज़ा है
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चुनाव में खड़े होने का नहीं, बैठने का मज़ा है

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** आप कहेंगे, चुनाव तो खड़े होने के लिए होते हैं। बिल्कुल होते हैं, पर जनाब, चुनावी गणित यूँ ही नहीं जमता। यहाँ असली खेल यह नहीं कि कौन खड़ा है, बल्कि यह है कि कौन किसे बैठा सकता है। जो जितने ज़्यादा प्रत्याशियों को अपने पक्ष में “बैठा” ले, वही असली विजेता होता है। कई नेता तो जनता से वोट माँगने से पहले ही आधे प्रत्याशी खड़े कर लेते हैं,ताकि समय आने पर उन्हें अपने पक्ष में बैठा सकें। और कुछ को जानबूझकर खड़ा रहने दिया जाता है, ताकि वे विरोधी के वोट काट सकें। यह भी लोकतंत्र का एक सूक्ष्म, किंतु सशक्त गणित है। इसी गणित के स्थायी अध्यापक हैं हमारे मोहल्ले के बब्बन चाचा,चुनाव चाहे विधानसभा का हो, संसद का, पार्षद का या सरपंच का,चाचा हर बार खड़े मिलेंगे। ऐसे खड़े जैसे बगुला ध्यान लगाए किसी शिकार ...
सड़कछाप सड़क का दर्शनशास्त्र
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सड़कछाप सड़क का दर्शनशास्त्र

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** सड़क का भी एक दर्शन होता है खासकर उस सड़क का, जो खुद सड़कछाप हो। वह सड़क जो कहीं टिककर नहीं रहती, हर मोहल्ले, हर मोड़, हर चुनावी वादे में आवारगी करती मिल जाती है। आजकल ऐसी सड़कें खूब चलन में हैं- चलन में इसलिए कि चलने लायक कम और दिखने लायक ज़्यादा होती हैं। सड़क साम्यवाद का जीवंत, धूल-धूसरित उदाहरण है। यहाँ गधे और घोड़े एक ही ताल में चलते हैं कभी-कभी तो पहचान ही गड़बड़ा जाती है कि कौन सा किस श्रेणी में है। पशु, पक्षी, मानव सबको सड़क समान भाव से अपनाती है। सड़क सबकी माँ है। अब अगर माँ की गोद में बैठकर कोई पूछे कि गधे-घोड़े का फर्क क्यों नहीं दिख रहा, तो इसमें माँ का क्या दोष! सड़क तो बस बनी है आओ, चलो, दौड़ो, गिरो, रौंदो जो लिखा लाए हो, वही होगा। आप सड़क पर हैं या सड़क पर लाए गए हैं यह नि...
डॉक्टर हड़ताल पर हैं
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डॉक्टर हड़ताल पर हैं

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** आज का दिन मेरी ज़िंदगी के सबसे मनहूस दिनों में बाकायदा दर्ज किए जाने लायक है। अब आप व्यंग्यप्रिय पाठक यह मत पूछ बैठिए कि क्या आज शादी की सालगिरह है। जनाब, मनहूसियत के लोकतंत्र में और भी कई अवसर होते हैं। आज डॉक्टरों की हड़ताल है। जी हाँ, धरती के भगवानों पर हो रहे अत्याचारों के विरोध में सारे भगवान बाकायदा हड़ताल पर हैं। अब आप सोचेंगे, इसमें मनहूस होने जैसा क्या है? हड़ताल का मतलब न ओपीडी की खटर-पटर, न इमरजेंसी की धमा-चौकड़ी ना ह मरीज़ों के रिश्तेदारों की। यानी एक दिन की खुली साँस। पर भाई साहब, इस बार डॉक्टर यूनियन ने हड़ताल को हड़ताल नहीं, नजरबंदी बना दिया है। फरमान हुआ है कि कोई शहर नहीं छोड़ेगा, कोई आउटिंग पर नहीं जाएगा। बस घर में बंद रहो और सामूहिक रूप से एक बार कलेक्ट्रेट जाकर ज्ञा...
“कवि, कविता और वो …”- कवि शब्दशेखर ‘उन्मुक्त’
व्यंग्य

“कवि, कविता और वो …”- कवि शब्दशेखर ‘उन्मुक्त’

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** कवि के लिए कविता जैसे चौथ का चाँद, और कवि जैसे चकोर- एकटक निहारता हुआ अपनी कविता को... कविता ही उसकी ओढ़नी, बिछावन, सब कुछ। कवि महोदय की रातें और पत्नी की नींद के बीच छिड़ जाती है छंदों की जंग। बस दिख जाए कविता- विचारों के उमड़ते-घुमड़ते बादलों के बीच कहीं एक झलक मिल जाए, एक पूँछ सी ही नजर आ जाए, फिर तो खींच के निकाल लेंगे बाहर! कवि बेचारा, कविता का मारा- मारा-मारा फिरता है जंगल में। कविता जैसे बाघिन- दिखेगी तभी ‘साइटिंग’ होगी। ‘दिखेगी तनिक गम्म तो खाओ! कवि अपनी लेखनी की बंदूक ताने बस फिरता है दिखे कहीं, तो करे शिकार। पूरी कविता नहीं तो पूँछ ही मिल जाए, उसी को ले जाकर दिखा देंगे! कविता की पूँछ पकड़ना भी बहुत ही "कवियोचित", काम है, मित्र। इधर कवि से अग्निसमक्ष सात फेरे लेकर आयी वो ..यानी...
जूता शास्त्र
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जूता शास्त्र

सुधा गोयल बुलंद शहर (उत्तर प्रदेश) ******************** पता नहीं लोग कहां से टूटे-फटे पुराने जूते उठा लाते हैं और मंचों पर फेंकने लगते हैं। कुछ को जूते लग भी जाते हैं तो कुछ माइक स्टैंड का सहारा लेकर बच भी जाते हैं। जोश में कुछ लोग अपने नए जूते भी उछाल देते हैं। मैं भी बचपन में कई बार इमली और अमिया तोड़ने के लिए पत्थर की जगह चप्पल उछाल देती थी। पर जब भी चप्पल पेड़ की फुनगी पर अटक गई और लाख कोशिशें के बाद भी नीचे नहीं गिरी तो चप्पल उछालना छोड़ दिया क्योंकि चप्पलों का उछालना कई बार बड़ा महंगा पड़ा। लोग चप्पल जूते की जगह सड़े टमाटर और सड़े अंडे उछालते हैं जो सामने वाले को घायल कम रंगीन अधिक कर देते हैं। महंगाई का जमाना है पुराने जूते काम आ सकते हैं पर सड़े टमाटर फेंकने के अलावा और किसी काम के नहीं रहते। अब इन्हें कहां फेंका जाए यह आपकी जरूरत पर निर्भर करता है। सड़कों पर जूते चलना आम बात ...
आश्वासन पुराण
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आश्वासन पुराण

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** सभा-मण्डप में धूप के छिन्न-भिन्न कण थिरक रहे थे। मध्य आसन पर विराजित महामुनि ने दीर्घ श्वास लेकर अपनी दृष्टि उस नवदीक्षित राजकुमार पर स्थिर की, जो राजनीति के रणक्षेत्र में प्रविष्ट होने के लिए अभिमन्यु- सा उत्साह लेकर आया था। राजकुमार ने करबद्ध होकर निवेदन किया “गुरुदेव, राजनीति का मार्ग कठोर और दुर्गम कहा गया है। कृपा कर वह दिव्य अस्त्र बताइए जिसके बल पर जनमानस जीता जा सके और सिंहासन की अक्षुण प्राप्ति हो।” मुनि के अधरों पर मंद मुस्कान उदित हुई; बोले- “वत्स, राजनीति में न शस्त्र काम आता है, न शास्त्र का गहन अध्ययन। यहाँ एक ही महामंत्र है आश्वासन। यही वह अदृश्य अस्त्र है जिसके बल पर राजसिंहासन डोलता भी है और टिका भी रहता है।” मुनि का स्वर गंभीर हुआ, “लोकतंत्र की भूमि में जो सबसे हरी-भरी...
बाप रे बाप
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बाप रे बाप

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** आज हम बात करेंगे ‘बाप’ की। भगवान ने सबको एक ही बाप दिया, लेकिन दुनिया में तो बापों की बाढ़ आई हुई है। हर कोई ‘बाप’ बनने पर तुला है, कोई ‘बेटा’ बनना नहीं चाहता। एयरपोर्ट, ट्रैफिक लाइट या रेलवे लाइन पर झगड़ते लोग अक्सर चिल्लाते मिलते हैं- “तू जानता है, मेरा बाप कौन है?” और कई बार कोई सीधा-सादा आदमी उन्हें जूतों से याद भी दिला देता है कि उनका बाप कौन है। जिसका बाप विधायक है, वो मोहल्ले में कोतवाल बनकर घूमता है। ‘बाप का आशीर्वाद’ लेकर गालियाँ बाँटता है, लोगों को डराता है। बाप बेचारा अपने बेटों की परवरिश में खुद कूट-कूटकर संस्कार भरता है और बदले में वही बेटे उसके सिर पर सवार होकर बाप के बाप बन जाते हैं। कहते है- “गुरु गुड़ रह गया, चेला चीनी हो गया”, और अब तो बेटा बाप का भी बाप बन गया है, ज...
मेरे दोस्त दुखीचंद
व्यंग्य

मेरे दोस्त दुखीचंद

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** "यह संसार दुखालय कहा गया है। दुख इस संसार का सबसे बड़ा प्रेरक बल है। दुःख न हो तो बाबाओं की, नेताओं की, अधिकारियों की दुकानदारी नहीं चले। दुःख है तो दुःख को रोने वाले हैं, दुःख प्रकट करने वाले हैं, विलाप करने वाले हैं! दुःख ही है जो आदमी के साथ जीवन भर चिपका रहता है। सुख क्या है? चार दिन की चांदनी- ऐसे गायब होती है जैसे चुनाव के बाद नेताजी, मतलब निकल जाने के बाद दोस्त।" ये विचार यूँ ही नहीं आए। इनके पीछे एक ठोस वजह है- मेरा मित्र विनोद, जिसे मैं प्रेम से दुखीचंद कहता हूँ। नाम उसका विनोद है, पर विनोद से उसका संबंध उतना ही है जितना संसद से शांति का। उसके चेहरे पर दुख का स्थायी भाव रहता है- मानो भगवान ने सारे दुखों का ठेका उसी को दे दिया हो। हम एक ही मोहल्ले में रहते हैं, इसलिए उससे बचना उ...
सतरंगी दुनिया- १९
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया- १९

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** भगवान ने हथेली के आगे अंगुलियाँ इसलिए बनाई है कि पहले आप कर्म करें, फिर भाग्य को महत्व दें। बिना कर्म के आपका अच्छा भाग्य नहीं बन सकता है। इंसान कितना भी गोरा क्यों न हो, परन्तु उसकी परछाई काली ही होती है। *मरने के बाद अर्थी को चार लोग कंधा देते हैं, अर्थात सहारा देते हैं। अगर इन चारों में से किसी एक ने जिन्दा रहते हुए उस व्यक्ति को सहारा दिया होता तो शायद मरने की नौबत नहीं आती।* एक बात गाँठ बांधकर रखिए- ज़िंदगी की दौड़ में जो आपको दौड़ कर नहीं हरा सकते, वे आपको तोड़ कर हराने की कोशिश जरूर करते हैं। उम्र के इस दौर में मैं क्या 'वैलेन्टाईन डे' मनाऊँगा, क्योंकि अब 'टेडी बियर' भी 'ठंडी बियर' सुनाई देता है। ज़िंदगी का यह कड़‌वा सत्य है कि हम पहला स्नान भी स्वयं नहीं कर पाते हैं और अंतिम स्नान भी हमें दूसरे लोग कराते हैं। ज़िं...
महिला उत्थान कार्यक्रम
व्यंग्य

महिला उत्थान कार्यक्रम

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** यहाँ एक ठरकी महाशय की महागाथा प्रस्तुत है, जिनकी ठरक किसी मनचले तूफान की तरह है कब, कहाँ, किसे उड़ा ले जाए, इसका कोई भरोसा नहीं। वैसे तो ये सरकारी नौकरी में हैं, लेकिन इन्हें लगता है कि समाज के इस आधे तबके के प्रति भी इनका दायित्व बनता है- जैसे भी, जहां भी, जितना भी बन पड़े… महिला उत्थान करना अनिवार्य है! तो ये खुद को "महिला सशक्तिकरण" का स्वयंभू मसीहा मान बैठे हैं। इनका दर्शन बड़ा स्पष्ट है जितनी अधिक महिलाओं का "उत्थान" करेंगे, उतनी ही अधिक इनकी आत्मा को तृप्ति मिलेगी। यूँ तो शादी-शुदा हैं, लेकिन सिर्फ घर की मुर्गी का ही उत्थान करें इस वहम से कोसों दूर हैं। इनका ध्येय वाक्य है- शादी-वादी सब ढकोसला है, असली मकसद तो महिलाओं के उद्धार में जीवन अर्पित करना है! महिला दिवस नज़दीक आते ही इन्...