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गद्य

सतरंगी दुनिया – २९
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया – २९

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ********************  वास्कोडिगामा अगर शादी-शुदा होता तो को कभी भी भारत की खोज नहीं कर पाता, क्योंकि कहां जा रहे हो ? कहाँ से आ रहे हो ? किसके साथ जा रहे हो ? कब वापस आओगे ? मुझे भी साथ ले चलो। मेरे लिए वहाँ से क्या लाओगे ? ये सब सवाल पूछने वाली पत्नी उसके पास नहीं थी। कभी साथ बैठोगे तो अपने दर्द बताएंगे, यूँ फोन से पूछोगे तो खैरियत ही बताएंगे। अब दुनिया भरोसे लायक नहीं रही, क्योंकि लोग अब कसम खाकर भी झूठ बोलते हैं। *उम्र से पहले ही बड़े हो जाते हैं वो बेटे, जिन्हें बाप से दौलत नहीं, बल्कि जिम्मेदारियाँ मिलती हैं।* आजकल नींद भी बदल गई है, अब सपने नहीं आते। अब तो थकान सुलाती है, और जिम्मेदारियाँ उठाती है। मैं वो समझदार हूँ, जिसे पता है कि मुझे किसने, कब और कितना बेवकू‌फ बनाया था। *भारत में सिर्फ १ प्रतिशत लड़कियाँ क्रिकेट, टैनिस, हॉकी और ...
हमारे त्योहारों का वैज्ञानिक महत्व
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हमारे त्योहारों का वैज्ञानिक महत्व

अनिता राजेश गुप्ता इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** भारत विविधताओं का देश है, जहां हर क्षेत्र, हर समुदाय और हर ऋतु के साथ अलग-अलग त्यौहार जुड़े हुए हैं। ये त्यौहार केवल आनंद और उत्सव का माध्यम ही नहीं है बल्कि उनके पीछे गहरे वैज्ञानिक, सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी कारण भी जुड़े हुए हैं। प्राचीन काल में हमारे ऋषि मुनियों ने अपने अनुभव और ज्ञान के आधार पर ऐसे नियम और परंपराएं बनाई जो मानव जीवन को स्वस्थ बनाए रखने में सहायक थी। त्यौहार उसी परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। सबसे पहले अगर हम त्यौहारों के समय पर ध्यान दें तो पाएंगे कि अधिकांश महत्वपूर्ण त्यौहार ऋतु परिवर्तन के समय मनाये जाते हैं; जैसे मकर संक्रांति सर्दियों के अंत और बसंत के आगमन का संकेत देती है। इसी दिन से सूर्य भगवान उत्तरायण होते हैं। इस त्यौहार में तिल-गुड़ खाने की परंपरा है जो कि शरीर को गर्म रखते हैं और ऊर्जा ...
दास्तान-ए-सांड
व्यंग्य

दास्तान-ए-सांड

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** मेरा जन्मदिन अभी दूर है, लेकिन हमारे यहाँ जन्मदिन की तैयारियाँ किसी चुनाव से कम नहीं होतीं-घोषणापत्र पहले, कार्यक्रम बाद में। इस बार तय हुआ है कि गायों को चारा और गुड़ खिलाकर जन्मदिन मनाया जाएगा। शहर में इन दिनों गौ-प्रेम फैशन में है। हर मोहल्ले में गौ-आश्रम उग आए हैं-कुछ श्रद्धा से, कुछ फोटो से और कुछ फेसबुक प्रेमियों के सेवा सेल्फी प्रेम से। जब से हमारे योग-गुरु बाबा ने सौंदर्य प्रसाधन से लेकर दवा-दारू तक में गाय का तड़का लगाया है, गाय पाँच सितारा शो-रूम की वस्तु बन चुकी है। देसी गाय अब श्रद्धा की नहीं, औकात की चीज़ हो गई है। गाय से हमारा रिश्ता नया नहीं है। बचपन से पाठ्यक्रम में थी-“गाय हमारी माता है।” निबंध में, उपलों में, होली की बालुडियों में, और सुबह के मक्खन में गाय बराबर मौजूद ...
सतरंगी दुनिया- २८
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया- २८

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ********************  पत्नी ने घर में ज्यादा खाना बनाया तो पति ने पूछा कि घर में खाने वाले हम ३ लोग हैं, फिर तुमने ढेर सारा खाना किसके लिए बनाया है। पत्नी ने प्यारा-सा उत्तर दिया,- मुझे बचे हुए भोजन से विविध व्यंजन बनाने की विधि सीखनी है। आजकल की नौकरानी का हाल देखिए, मालकिन ने नई नौकरानी को समझाते हुए कहा, देख मैं ज्यादा बोलना पसंद नहीं करती। अगर में अंगुली का इशारा करूं तो समझ लेना कि में बुला रही हूँ। नौकरानी बोली,- मैडम मैं भी ज्यादा बोलना पसंद नहीं करती। अगर मैं सर हिला दूं तो आप समझ लेना कि मैं नहीं आ सकती। *एक ६० साल की उम्र वाले व्यक्ति की टी शर्ट पर एक शानदार वाक्य लिखा था- मेरी उम्र ६० साल नहीं है, मैं तो केवल १६ साल का हूँ ४४ साल के अनुभव के साथ। इसे कहते हैं नजरिया।* परमात्मा कभी किसी का भाग्य नहीं लिखता है, बल्कि जीवन के ...
छाया वृक्ष की जड़ों से बंधी होती है
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छाया वृक्ष की जड़ों से बंधी होती है

आशा शर्मा धरमपुरी, इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** हमारी परंपराएं हमारी जड़ हैं, और हमारे बुजुर्ग वो पेड़ हैं, जिनकी छत्रछाया में हमारे घर परिवार का सम्मान सुरक्षित है। आज इतनी उच्छृंखलता श्री पीढ़ी में देखने को मिलती है, उसका मूल कारण है कि, आज बुजुर्गों को बेकार सामान समझकर रातों उन्हें वृद्ध आश्रम भेज दिया जाता है, अथवा घर में कोई भी उनकी सलाह लेना आवश्यक नहीं समझता है बस एक गैरजरूरी सामान समझकर उनका अपमान किया जाता है। वे दुखी होकर चुपचाप बैठे रहते हैं और समझौता कर लेते हैं। नतीजा हमारे सामने है। माता पिता आधुनिकता की दौड़ में बच्चों को मंहगी शिक्षा तो दिलवा रहे हैं, परंतु मर्यादित जीवन जीने की और संस्कृति और संस्कारों की शिक्षा जो केवल जो जी चुके है, जीवन को उन्हें ही पता है। वह शिक्षा नहीं देता रहे हैं। बच्चे भटक रहे हैं। मनमानी न होने पर जीवन तक समाप्त करने को ...
गया जी का भास्कर-धाम-दर्शन : एक आध्यात्मिक संस्मरण
संस्मरण

गया जी का भास्कर-धाम-दर्शन : एक आध्यात्मिक संस्मरण

नरेंद्र सिंह मोहनपुर, अतरी, गया जी (बिहार) ******************** आज का सायंकाल मेरे लिए केवल एक सामान्य संध्या न होकर श्रद्धा, संस्कृति, मित्रता और आध्यात्मिक अनुभूति का एक अविस्मरणीय अवसर बन गया। गया जी में फल्गु नदी के पूर्वी तट पर स्थित पुराने पुल के निकट भास्कर घाट पर नवनिर्मित भव्य विराट सूर्य मंदिर और भगवान भास्कर के दर्शन और पूजन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यह यात्रा केवल देवदर्शन तक सीमित नहीं रही, अपितु उसने मन को भारतीय सनातन संस्कृति की गहराइयों तक पहुँचाने का कार्य किया। सूर्य अस्ताचल की ओर अग्रसर थे। उनकी स्वर्णिम किरणें अंतः सलिला फल्गु के शांत तट पर बिखरकर एक अलौकिक छटा उत्पन्न कर रही थीं। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो स्वयं मार्तण्ड अपनी अंतिम किरणों से नव-निर्मित मंदिर का अभिषेक कर रहे हों। मंदिर की भव्यता, उसकी स्थापत्य-कला, उद्यान और वातावरण की पवित्रता ने...
स्वराज्य के विचार का राज्याभिषेक
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स्वराज्य के विचार का राज्याभिषेक

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** इतिहास में कुछ तिथियाँ केवल कैलेंडर के पन्नों पर अंकित दिन नहीं होतीं, वे राष्ट्र की चेतना में सदैव जीवित रहने वाली प्रेरणाएँ बन जाती हैं। ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी, ६ जून १६७४ का दिन भारतीय इतिहास की ऐसी ही एक अमर तिथि है, जब रायगढ़ की पवित्र धरती पर श्रीमंत छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक हुआ। यह घटना किसी राजा के सिंहासनारोहण का मात्र राजकीय आयोजन नहीं थी, बल्कि भारतीय स्वाभिमान, सांस्कृतिक अस्मिता और स्वाधीन शासन की उद्घोषणा थी। उस दिन एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि स्वराज्य के विचार का राज्याभिषेक हुआ था। सत्रहवीं शताब्दी का भारत राजनीतिक अस्थिरता, विदेशी प्रभुत्व और सामाजिक निराशा के दौर से गुजर रहा था। सत्ता का केंद्र जनता से दूर था और शासन का उद्देश्य लोककल्याण के बजाय साम्राज्य विस्तार बन चुका था। ऐसे सम...
देवलोक का अमृतकाल बनाम मृत्युलोक में मानवता का पतनकाल
व्यंग्य

देवलोक का अमृतकाल बनाम मृत्युलोक में मानवता का पतनकाल

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** देवराज इंद्र की सभा सजी थी। देवलोक में "अमृतकाल महोत्सव" चल रहा था। अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं, अमरबेल के पुष्प बरस रहे थे और सोमरस की स्टॉल पर ऐसी भीड़ थी जैसी मृत्युलोक में तंदूरी रोटी की दुकान पर लगती है। तभी सभा में देवर्षि नारद का आगमन हुआ। इंद्र ने मुस्कुराकर कहा, “अहोभाग्य! आजकल तो आपका अधिक समय मृत्युलोक में ही बीतता है। कहीं किसी गठबंधन सरकार में मंत्री पद मिल गया क्या?” नारद ने कटाक्ष अनसुना कर पूछा, “देवराज, बताइए, देवता, दानव और मानव में श्रेष्ठ कौन है?” इंद्र चौंके, “अब आप भी हमारी श्रेष्ठता पर प्रश्न उठाने लगे? कहीं मृत्युलोक की विपक्षी शक्तियों ने आपको प्रभावित तो नहीं कर दिया?” नारद मुस्कराए, “नहीं इंद्र, पर सत्य यही है कि आज सबसे शक्तिशाली मानव है। उसने अपना अलग संसार ब...
सतरंगी दुनिया -२६
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया -२६

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** *अजीब बात है, कि वो इंजीनियर नहीं है फिर भी तारीफ के पुल बाँध लेता है।* हँसना स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद है, पर दूसरों पर हँसना हमारे लिए हानिकारक है। उम्र बढ़ने के साथ हमें यह नहीं सोचता चाहिए कि हम ओल्ड हो गए हैं, बल्कि ऐसा सोचना चाहिए, कि हम तपकर गोल्ड हो गए हैं। उमर कहती है कि अभी थोड़ी भक्ति कर ले, पर दिल कहाँ है, मानता वो तो कहता है कुछ मस्ती कर ले। *यदि आप उम्र को हराना चाहते हैं, तो आप अपने शौक जिन्दा रखिए।* यदि आप खुश रहना चाहते हैं तो इस बात पर ध्यान मत दीजिए कि कौन क्या कर रहा है, कब कर रहा है और क्यों कर रहा है ? अब मुझे उम्र समझाती है कि अब जिंदगी की शाम हो गयी है, परतुं दिल कहता है कि महफिल तो शाम को ही शुरू होती है। बुढ़ापे में भी जवानी का जोश रखिए। माना हमारा तन कछुआ होता है, मगर जनाब हमारा मन तो खरगो...
माता कैकेई – चरित्र वर्णन
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माता कैकेई – चरित्र वर्णन

आशा शर्मा धरमपुरी, इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** सूक्ष्म परिचय- माता कैकेई कैकय देश की राजकुमारी थी। वे शास्त्र और शस्त्र विद्या में निपुण थीं। उन्हें राजनीति का भी सम्यक ज्ञान था। इसीलिए वे देवासुर संग्राम में राजा दशरथ की सारथी बनकर उनके साथ रहीं। जब महाराज दशरथ घायल हो गए, तो कुशल राजनीतिज्ञ की भांति उन्हें सुरक्षित बचाकर ले आई थी। एक युद्ध में रावण ने जब उनके रुप और सौंदर्य पर कटाक्ष किया तो, उन्होंने कहा कि इक्ष्वाकु वंश में जन्मा बालक ही तुझे मृत्यु की गोद में सुलाएगा। मेरा यह वचन है। तेरे समूल वंश को मिटा देगा और इस अपमान का जवाब तुझे अवश्य देगा। समय बीतता गया जब भगवान राम का अवतार हुआ कैकयी की प्रसन्नता का कोई ठिकाना नहीं था। वे जानती थी कि यह नारायण हैं। माता कौशल्या से भी अधिक प्रेम वे राम से करती थी। जब रामजी के राज तिलक की घोषणा हुई तो वे माता कैकेई स...
चिंता शिविर
व्यंग्य

चिंता शिविर

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** आज तड़के ही पड़ोसी शर्मा जी आ धमके। हाथ में मेरा वही अख़बार था, जिसे वे रोज़ की तरह “पढ़ने के लिए उधार” ले गए थे और पढ़कर अब “ज्ञान बाँटने” लौटाए थे। अख़बार के भीतर से एक पम्पलेट भी झाँक रहा था, मानो वह स्वयं शर्मिंदा हो कि अख़बार के साथ ग़लती से लौट आया है। हमारे शर्मा जी पड़ोसी धर्म का पूरा निर्वाह करते हैं, अख़बार मेरा, पढ़ते वे; चाय मेरी, पीते वे; और अखवार की ख़बरें ऐसी सुनाते हैं जैसे स्वयं रिपोर्टर हों। आज चाय की पहली चुस्की के साथ उन्होंने पम्पलेट मेरी ओर बढ़ाया, “आप तो वैसे भी अख़बार नहीं पढ़ते, कम से कम पम्पलेट ही देख लिया करो। शहर में बड़ा ज़रूरी कार्यक्रम होने जा रहा है।” मैंने सहज अनुमान लगाया, “कोई नया शो-रूम, चमत्कारी वैद्य, असफल प्रेम को सफल करने का कोर्स, या फिर किसी ...
भारत के आत्मगौरव और स्वामी विवेकानंद की ऐतिहासिक यात्रा
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भारत के आत्मगौरव और स्वामी विवेकानंद की ऐतिहासिक यात्रा

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** भारत के इतिहास में कुछ तिथियाँ केवल कैलेंडर का हिस्सा नहीं होतीं, वे राष्ट्र की चेतना में अमिट स्मृति बन जाती हैं। ३१ मई १८९३ ऐसी ही एक तिथि है। यह वह दिन था जब भारतभूमि का एक युवा संन्यासी, साधारण गेरुआ वेशभूषा में, सीमित संसाधनों के साथ, परंतु असीम आत्मविश्वास और अद्भुत आध्यात्मिक शक्ति को अपने भीतर समेटे हुए, भारतभूमि से विश्व मंच की ओर प्रस्थान कर रहा था। वह कोई राजा नहीं था, न किसी साम्राज्य का दूत और न ही किसी राजनीतिक शक्ति का प्रतिनिधि। वह भारत की आत्मा का वाहक था। वह थे "स्वामी विवेकानंद।" उस समय भारत अंग्रेज़ी दासता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था। चारों ओर निराशा, हीनभावना और सांस्कृतिक असुरक्षा का वातावरण था। पश्चिमी सभ्यता की चमक के सामने भारतीय समाज अपनी ही परंपराओं पर प्रश्नचिह्न लगाने लगा था। भारत की...
अब्राहम अकॉर्ड्स: बदलती वैश्विक राजनीति का दर्पण
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अब्राहम अकॉर्ड्स: बदलती वैश्विक राजनीति का दर्पण

किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया (महाराष्ट्र) ******************** ट्रम्प बनाम मौजतबा खामनेई और बदलती मिडिल ईस्ट जियोपॉलिटिक्स -पश्चिम एशिया में नई ध्रुवीय राजनीति का उदय? अब्राहम अकॉर्ड्स केवल एक शांति समझौता नहीं, बल्कि २१वीं सदी की नई जियोपॉलिटिकल व्यवस्था का प्रतीक बन चुका है। अब्राहम अकॉर्ड्स में संभावतः तेल, व्यापार मार्ग, सैन्य प्रभाव हथियारों का बाजार, चीन-रूस की बढ़ती मौजूदगी और वैश्विक शक्ति संतुलन की लड़ाई भी छिपी हुई है- वैश्विक स्तरपर पश्चिम एशिया की राजनीति एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहां कूटनीति, धर्म, सुरक्षा, ऊर्जा और वैश्विक शक्ति संतुलन एक-दूसरे से टकराते हुए नजर आ रहे हैं। इसी बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य के केंद्र में है अब्राहम अकॉर्ड्स एक ऐसा समझौता जिसे अमेरिका ने इजरायल और अरब देशों के बीच दशकों पुरानी दुश्मनी खत्म करने के लिए तैयार करा...
सतरंगी दुनिया – २५
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया – २५

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ********************  आज प्रधानमंत्री द्वारा देश की जनता से जो निवेदन किया गया, उसका असर अब दिखने लगा है। आज सुबह-सुबह कामवाली बाई का फोन आया- बर्तन, कपड़े मेरे घर-घर भेज दो। मोदी जी ने वर्क फ्राम होम का आर्डर दिया है। *जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, छोटे अक्षर दिखाई नहीं देते। शायद यह एक इशारा ही है, कि बढ़‌ती उम्र के साथ छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज करें।* इस दुनिया में खुश वही लोग हैं, जो स्वयं का मूल्यांकन करते हैं, और दुखी वो हैं, जो दूसरों का मूल्यांकन करते हैं। अजीब बात है कि एक पत्थर एक बार मंदिर जाने पर भगवान बन जाता है, परन्तु इंसान हजार बार मंदिर जाता है पर इंसान नहीं बन पाता है। अपने रिश्तों की बगिया में एक रिश्ता नीम के पौधे जैसा भी रखिए, जो सीख भले ही कड़वी देता है, पर तकलीफ में मरहम का काम करता है। *आधुनिक युग मिलावट का युग है। सब...
नमो भारत : भारत की आधुनिक और तेज़ रफ्तार परिवहन क्रांति
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नमो भारत : भारत की आधुनिक और तेज़ रफ्तार परिवहन क्रांति

नील मणि मवाना रोड (मेरठ) ******************** भारत तेज़ी से आधुनिक परिवहन व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। इसी दिशा में दिल्ली-मेरठ रीजनल रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (RRTS) के अंतर्गत चल रही “नमो भारत” रैपिड रेल ने नया इतिहास रच दिया है। यह केवल एक ट्रेन नहीं, बल्कि भविष्य की स्मार्ट, सुरक्षित और तेज़ यातायात व्यवस्था का प्रतीक बन चुकी है। इसकी गति और आधुनिक सुविधाओं ने पारंपरिक मेट्रो प्रणालियों के कई रिकॉर्ड पीछे छोड़ दिए हैं। “नमो भारत” भारत की पहली क्षेत्रीय त्वरित परिवहन प्रणाली (RRTS) है, जिसे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र परिवहन निगम (NCRTC) द्वारा विकसित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य दिल्ली, गाज़ियाबाद और मेरठ जैसे शहरों के बीच तेज़, आरामदायक और समयबद्ध यात्रा उपलब्ध कराना है। मेरठ से दिल्ली की मेरी हाल की यात्रा इस बार कुछ अलग और यादगार रही। वर्षों से सड़क के लंबे जाम, धूल, धक्का-म...
वो आ रहे हैं देखने के लिए
व्यंग्य

वो आ रहे हैं देखने के लिए

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** “सुनो, आज शाम चार बजे दूसरी पार्टी आ रही है… देखने के लिए।” “अच्छा...! फिर वही घबराहट शुरू हो गई। कहीं ये भी पहली पार्टियों की तरह...! देखो, ऑफिस से किसी को भेज दो, उन्हें रास्ते से ही ले आए। कहीं लोकेशन पूछते-पूछते पड़ोसियों के चंगुल में न फँस जाएँ। मुझे डर है कि वहाँ पहुँचकर कहीं आसपास पड़ोस से पूछताछ न कर लें, पहले की तरह... उन्हें बहका न दे... पड़ोसी बदनाम करने में सबसे आगे रहते हैं... पहले भी न जाने कितनी पार्टियों को बहकाया है।” बात सही थी। कई पार्टियाँ पहले भी आईं। चाय पी, नाश्ता किया, मुस्कराईं, कागज़ देखे और जाते-जाते कह गईं, “मीडिएटर को बता देंगे।” मीडिएटर ने भी जाते-जाते ऐसा आश्वासन दिया, जैसे बारात बस दरवाज़े पर ही खड़ी है। पर चार दिन बीत गए, न हाँ आई, न ना। अब आदमी इंतज़ार...
श्रद्धा
लघुकथा

श्रद्धा

आशा शर्मा धरमपुरी, इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** यह कोई कहानी नहीं, सत्य घटना है। मेरे जीवन में ऐसी कई घटनाएं हुई जो हृदय को छू गई। कुछ सिखा दिया, कुछ अच्छा करवा दिया, ईश्वर कृपा रही है। नवरात्रि की नवमी तिथि थी। मैं उस स्थान पर कुछ समय पहले ही रहने आई थी। मेरी एक परिचित को मैंने कहा कि कन्या भोजन के लिए तुम कन्याओं को बुला लाओ। उन्हीं कन्याओं में तीन बहनें थीं, उनकी मां उन्हें लेकर आई। मैंने कहा आप भी भोजन कर लें, वह बोली नहीं मां को हलवा का भोग लगाकर ही हमेशा पूजन करने के बाद व्रत खोलती हूं। यह कहते-कहते उसकी आंखें भर आईं, मैंने पूछा तो आपने अभी तक भोग क्यूं नहीं लगाया, वह जो बोली उसे सुनकर मैंने अपने आपको मुश्किल से आंसू बहने से रोका था। उसने कहा कि मेरे पति का एक्सीडेंट हो गया है। कमाई का साधन नहीं है। मेरे पास टंकी है, स्टोव है, पर पैसा नहीं कि मैं तेल लगाकर य...
हल्दीघाटी- अमर स्वाभिमान
आलेख

हल्दीघाटी- अमर स्वाभिमान

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** १८ जून भारतीय इतिहास की वह अमर तिथि है,जो केवल एक युद्ध का स्मरण नहीं कराती बल्कि त्याग, स्वाभिमान, साहस और मातृभूमि के प्रति अटूट समर्पण की गाथा सुनाती है। यह वह दिन है जब मेवाड़ की धरती पर एक ऐसा संघर्ष हुआ, जिसने इतिहास के पन्नों में वीरता की अमिट छाप छोड़ दी। वर्ष १५७६ में "हल्दी घाटी" के रूप में लड़ा गया यह युद्ध केवल तलवारों की टकराहट नहीं था, बल्कि स्वतंत्रता और अधीनता, स्वाभिमान और सत्ता के बीच का निर्णायक संघर्ष था। 'राजस्थान की अरावली पर्वतमालाओं के बीच स्थित हल्दीघाटी' आज भी उस ऐतिहासिक दिन की मौन साक्षी है। इसकी पीली मिट्टी मानो आज भी उन वीरों के रक्त से रंजित गौरवपूर्ण स्मृतियों को अपने भीतर संजोए हुए है, जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर आने वाली पीढ़ियों को स्वतंत्रता और आत्मसम्मान का मूल्य समझा...
तालमेल
आलेख

तालमेल

माधवी तारे लंदन ******************** सब देवी देवताओं के आग्रह और नम्र निवेदन पर ब्रह्मा ने सृष्टि निर्माण करने की जिम्मेदारी अपने पर ली। परंतु भागवत कह कर जैसे श्री व्यास मुनि को कार्य की सार्थकता नहीं लग रही थी। मन में लगता रहा कि इसमें कुछ कमी रह गई है। बाद में जब सुकदेव मुनि ने नैमिषारण्य में परीक्षित राजा जो भागवत कथा सुनाना शुरू किया तब उन्हें अपने कृतित्व की सार्थकता लगने लगी। ऐसी ही स्थिति ब्रह्मा की सृष्टि निर्माण करने के बाद हुई होगी, जब तक सरस्वती की वीणा की झंकार प्रकृति में नहीं गूंजी और पक्षियों का कलरव और नदी की कलकल उन्हें नहीं सुनाई दी, तब तक ब्रह्माजी को आनंद की प्राप्ति नहीं हुई। झरनों से बहते, कलकल करती नदियों के संगीत से पूरी प्रकृति रममाण हुई। मनुष्य और प्रकृति के तालमेल की शुरुआत हुई। अनेक वर्ष यह तालमेल बढ़िया चल रहा था लेकिन लालच ने जब मनुष्य की बुद्धि को छुआ तो ...
सतरंगी दुनिया- २३
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया- २३

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ********************  जो लोग आपको नहीं समझते- उन्हें मत सममझाइए। समुंदर खारा है-खारा ही रहेगा, उसमें शक्कर मत मिलाइए। हम अक्सर खून की जांच करवाकर देखते हैं, कि शरीर में कैल्शियम और विटामिन घट तो नहीं रहे हैं। मेरे ख्याल से कभी ऐसे अपने व्यक्तित्व की भी जाँच करवा लेनी चाहिए। क्या पता दया, करुणा, मानवता, दोस्ती और इंसानियत भी घट रही हो। याद रखिए- तारीफ करने वाला आपकी स्थिति देखता है और परवाह करने वाला आपकी परिस्थिति देखता है। *भुट्टा बेचने वाला फूट-फूट कर रोया, जब एक एक मार्डन लड़‌की ने कहा- अंकल एक हैंडिल वाला पापकॉर्न देना।* हमारे साथ अक्सर वही लोग चलते हैं, जिन्हें हमसे फायदा नहीं बल्कि हमारी फिक्र होती है। १९९० में लड़कियाँ डरती थी कि सास कैसी मिलेगी ? २०२० में सास डर रही है, कि बहू कैसी मिलेगी ? देखिए अजीब संजोग कि जो लड़‌कियाँ १९९० ...
अगले जनम मोहे एनआरआई कीजे
व्यंग्य

अगले जनम मोहे एनआरआई कीजे

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** आजकल का सबसे बड़ा अचीवमेंट क्या है? बस यही कि एनआरआई बन जाओ, या कोई एनआरआई दामाद घर ले आओ। मन में पहले कभी ऐसा कोई भाव नहीं था, पर पड़ोसी और रिश्तेदारों ने इतनी बार टोंट बाजी की कि मन में एक टीस-सी बस गई। हर तीसरे दिन कोई न कोई टोक देता, “यार, तुम एनआरआई क्यों नहीं बने? वहां डॉक्टरी में ज्यादा पैसा, ज्यादा ठाठ है !” कॉलेज के दिनों में देखा, कई साथी युएस एम्एलए की तैयारी ऐसे करते थे जैसे भारत की हवा से उन्हें अचानक एलर्जी हो गई हो। शरीर उनका भले यहाँ हो, पर आत्मा अमरीका-यूरोप की सड़कों पर ही टहलती रहती थी। शायद उनकी आत्मा को ग्रीन कार्ड पहले ही मिल चुका था। हमारी आत्मा जिद्दी निकली, इसे तो हमसे अलग होना ही नहीं था। हमने लाख मनाया, “जरा बाहर घूम आओ, कम से कम तुमको तो वीज़ा नहीं चाहिए।” आ...
भोजशाला : केवल एक स्मारक नहीं, भारत की आत्मा का स्वर
आलेख

भोजशाला : केवल एक स्मारक नहीं, भारत की आत्मा का स्वर

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** भारत केवल भूगोल का एक टुकड़ा नहीं है, यह हजारों वर्षों की संस्कृति, ज्ञान, साधना और अध्यात्म की जीवित चेतना है। इस चेतना को यदि कहीं मूर्त रूप में देखा जा सकता है, तो वह हमारी प्राचीन शिक्षण परंपराओं, मंदिरों और सांस्कृतिक धरोहरों में दिखाई देती है। मध्यप्रदेश की पावन धरती पर स्थित धार की भोजशाला भी ऐसी ही एक अमूल्य धरोहर है, जो केवल पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा, माँ सरस्वती की आराधना और राजा भोज के सांस्कृतिक वैभव की जीवंत गाथा है। मालवा की ऐतिहासिक नगरी धार सदियों से विद्या, कला और संस्कृति का केंद्र रही है। परमार वंश के महान प्रतापी राजा भोज ने इस भूमि को केवल शासन का केंद्र नहीं बनाया, बल्कि इसे ज्ञान की राजधानी के रूप में स्थापित किया। इतिहास के पन्ने बताते हैं कि जिस प्रकार तक्षशिला औ...
रहमदिल
लघुकथा

रहमदिल

अमिता मराठे इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** अरे! अब इस बहरे को कैसे समझाऊँ कि कचरा ठीक से साफ करे। अजी सुनते हो! मैं परेशान हो गई हूँ। अपने बंगले में जरा ढंग के नौकर रखो। कहते-कहते थक गई हूँ। श्रीमती वर्मा झुँझलाकर वर्मा जी की ओर देखने लगीं, जो आराम से समाचार-पत्र पढ़ने में मग्न थे। “माली अपंग है, सफाई करने वाला गूंगा-बहरा। और रसोई वाली गंगा- जितना कहो, उतना ही काम करती है बस। देखो जी, आज ही इन सबको हटाओ और स्वस्थ, समझदार लोग रखो।” गुस्से में बड़बड़ाती हुई वे बाहर आ गईं। उन्होंने देखा, सभी कर्मचारी हाथ जोड़े खड़े थे। “रहम करो माताजी,” गंगा बोली, “बाबूजी हमारे लिए देवता हैं। उन्हीं की बदौलत हमारे घरों के चूल्हे जलते हैं।” तभी वर्मा जी धीरे से उठे और उन्होंने अपना दुर्घटना में क्षतिग्रस्त हाथ आगे बढ़ाया और मुस्कराकर बोले- माताजी, “समय कब किसे दूसरों के सहारे खड़ा कर दे, ...
रिटामटमेंट
लघुकथा

रिटामटमेंट

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ********************  रामशरण जी कालेज में प्रोफेसर थे। स्वभाव के मस्त-मौला थे। अपने काम से मतलब रखते थे, अपने कर्तव्य के प्रति हमेशा जागरूक रहते थे, इसलिए छात्रों में भी वे लोकप्रिय थे। समय बीतता गया, आखिर उनके रिटामटमेंट का समय भी आ गया। रिटायरमेन्ट के बाद उन्होंने एक बड़ी पार्टी का आयोजन किया, जिसमें उनके प्रोफेसर साथी, कालेज का स्टॉफ, पूर्व छात्रों तथा अपने दोस्तों और रिश्तेदारों सभी को आमंत्रित किया। पार्टी आराम से चल रही थी। अचानक उनकी पत्नी शीला चक्कर खा कर गिर पड़ी। रंग में भंग पड़ गया गया। शीला जी को तुरंत अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टर ने जाँच करके कहा, "ये अब जिन्दा नहीं हैं।" खुशी का माहौल दु:ख में बदल गया। देखिए, प्रकृति का खेल-रामशरण जी कालेज से रिटायर हो गए और उनकी पत्नी इस दुनिया से रिटायर हो गयी। असली रिटामटमेंट किसका था, म...
श्रीमंत छत्रपति संभाजी महाराज- वह ज्वाला जिसे यातनाएँ भी बुझा न सकीं
आलेख

श्रीमंत छत्रपति संभाजी महाराज- वह ज्वाला जिसे यातनाएँ भी बुझा न सकीं

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** भारतीय इतिहास का गगन अनेक वीरों की गाथाओं से आलोकित है, किंतु कुछ नाम ऐसे हैं जो केवल इतिहास का हिस्सा नहीं बनते, बल्कि राष्ट्र की आत्मा में सदैव जीवित रहते हैं। श्रीमंत छत्रपति संभाजी महाराज ऐसे ही एक अमर व्यक्तित्व हैं, जिनका जीवन साहस, स्वाभिमान, विद्वता और बलिदान का अद्वितीय संगम था। दुर्भाग्य से इतिहास के अनेक पन्नों में उनके व्यक्तित्व को उतनी व्यापकता नहीं मिली, जिसके वे वास्तविक अधिकारी थे। उनके जीवन को केवल युद्धों और बलिदान तक सीमित कर दिया गया, जबकि सत्य यह है कि संभाजी महाराज केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि राष्ट्रचेतना के प्रखर प्रहरी थे। आज जब समाज वैचारिक भ्रम, सांस्कृतिक विस्मृति और इतिहास की अधूरी व्याख्याओं से जूझ रहा है, तब संभाजी महाराज का जीवन हमें यह स्मरण कराता है कि राष्ट्र केवल तलवारों से नहीं...